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सदक़ा और खैरात क्या हैं? (What is Sadqa and khairat)

सदक़ा और खैरात क्या हैं? (What is Sadqa and khairat)

ज़कात फ़ितरा के अलावा नफ्ली तौर पर इबादत की नियत से अल्लाह की रज़ा के लिए अल्लाह के बन्दों के लिए हम जो कुछ खर्च करते हैं, उसे सदक़ा खैरात कहा जाता हैं। यही नहीं बल्कि इस्लाम में तो तकलीफ पहुँचाने वाली किसी चीज़ को रास्ते से हटा देने को भी सदक़ा कहा जाता है। सदक़ा की तौफीक बन्दों के लिए एक इनाम हैं। क्यूंकि इस की बरकत से अल्लाह पाक हमें बहुत सारी बलाओं से महफूज़ रखता हैं, बचाता हैं, हमारी हिफाज़त फरमाता हैं। यही नहीं बल्कि इससे बन्दे के गुनाह भी माफ़ हो जाया करते हैं। अल्लाह के रसूल पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया सदक़ा इस तरह गुनाहो को बुझा देता हैं जिस तरह पानी आग को बुझा देती हैं।

अल्लाह की दी हुई रोज़ी और दौलत को दुसरो पर खर्च करना कोई मामूली या आसान काम नहीं बल्कि बड़े दिल गुर्दे की बात हैं। आदमी के खुद के इतने काम और ज़िम्मेदारियां हैं की उन्हें पूरा करना आज के इस महंगाई के दौर में कितना बड़ा काम हैं। फिर उसके ऊपर गरीब मजबूरो की और मदद करना ये और बड़ी बात हैं। आदमी अगर हिम्मत करके यह नेक काम कर गुज़रता हैं, और लगातार करते रहता हैं तो उसके बदले अल्लाह पाक उसकी भी सारी ज़रूरते पूरी फरमाता हैं। और अल्लाह पाक उसकी इतनी मदद करता हैं जितनी मदद शायद ही उस शख्स ने कभी सोची होगी और सबसे बड़ी बात तो यह हैं की मौत के वक़्त उसकी रूह बड़ी आसानी से कब्ज़ हो जाती हैं। और मरने के बाद अल्लाह के दरबार में पेशी के मौके पर अल्लाह पाक उससे राज़ी होगा।

हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहो अन्हो का बयान हैं एक गुनहग़ार औरत थी। वह एक कुएं से गुज़रने लगी तो वहां एक कुत्ता बैठा था, जो प्यास के मारे मरने जैसा हो रहा था। औरत को उसकी हालत पर तरस आ गया। वह रुक गई। किसी तरह बड़ी मशक्कत(मेहनत) से उस औरत ने कुँए में से पानी निकाला, और उस कुत्ते की प्यास बुझाई। अल्लाह को उस गुनहग़ार औरत की यह बात इतनी पसंद आयी की इस सदके के बदले अल्लाह पाक ने उसके सारे गुनाहो को माफ़ करके उसे बख्श दिया।

अल्लाह की बनायीं हर मखलूक चाहे इंसान हो या जानवर के काम आना, उनकी ज़रूरते पूरी करना भी एक सदक़ा हैं। इस्लाम में इसे भी इबादत का दर्जा दिया गया हैं। इसीलिए अल्लाह के रसूल ने मुसलमानो को दुखियो के काम आने उनकी मदद करने की ताकीद फ़रमाई हैं। हज़रत अबू सईद खुदरी रदियल्लाहो अन्हो का बयान हैं की अल्लाह के रसूल पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जो आदमी अपने किसी भाई को जिस के बदन पर ज़रूरत के मुताबिक कपड़ा न हो, उसे कपड़ा पहनायेगा या देगा। अल्लाह पाक उसे जन्नत का हर जोड़ा पहनायेगा। और जो किसी भूके भाई को खाना खिलायेगा अल्लाह पाक उसे जन्नत के मेवे खिलायेगा। जो किसी प्यासे को पानी पिलायेगा अल्लाह पाक उसे जन्नत का मोहर बंद शरबत पिलायेगा।

आजकल के लोग बस पैसा जमा करने में लगे हैं। एक रुपया गरीबो पर खर्च करने में दस बार सोचते हैं। लाखो रूपए कमाते हैं मगर अल्लाह की राह में खर्च करने में कतराते हैं। वह सोचते हैं की ये जमा पैसा ज़िन्दगी और अच्छी जीने में काम आएगा। सोचो अगर ज़िन्दगी ही न रहे या किसी खतरनाक बीमारी में ही वह सारा पैसा मिनटों में खत्म हो जाये, यह बात कोई नहीं सोचता। खैर क्या हमने कभी सोचा अल्लाह पाक हमारी हर छोटी छोटी ज़रूरते पूरी फरमाता रहता हैं। हमें पानी देता हैं, खाना देता हैं, साँस लेने के लिए हवा देता हैं, जिससे हम ज़िंदा हैं। अगर अल्लाह चाहे तो एक पल में बारिश बंद कर दे, जिससे नदी तालाब सुख जाये और खाना-पानी मिलना बंद हो जाये लेकिन अल्लाह पाक ने कभी ऐसा कुछ नहीं किया क्यूंकि वो बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला हैं। इसी तरह इंसान को भी सोचना चाहिए की अगर खुदा हमे इतना दे रहा हैं तो हम उसके बन्दों को कुछ देने में क्यों पीछे रहे। अगर हम अपने रब की रज़ा के लिए किसी की मदद करेंगे तो हमारा रब भी बहुत खुश होगा और हमें हमेशा दुनिया और आख़िरत की नेअमते अता फरमाता रहेगा।

इंसान की यह सोच गलत हैं की हम जो कमाते हैं, वह सब हमारा ही हैं। ये सोचो की हमें ऊपर वाला रिज़्क़ दे रहा हैं अगर वो बंद कर दिया तो क्या होगा। हमें चाहिए की हम सब का हक़ अदा करने की कोशिश करे। अल्लाह के प्यारे रसूल पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया किसान खेती करता हैं, उसकी फसल में से बहुत से दाने परिंदे चरिन्दे खा जाते हैं। इससे किसान को मायूस नहीं होना चाहिए क्यूंकि जो कुछ जानवर खा जाते हैं। उसके बदले किसान को सदके का सवाब मिलता हैं। जो बहुत बड़ी बात हैं, इसलिए हमें सदक़ा खैरात करते रहना चाहिए। अल्लाह पाक हम सब को सदक़ा खैरात करने की तौफीक अता फरमाए  आमीन । 

बेनमाज़ी की सजा अज़ाब और अंजाम (Benamazi Ki Saza-Azab-Or-Anjam)

बेनमाज़ी की सजा अज़ाब और अंजाम (Benamazi Ki Saza,Azab or Anjam)

अल्लाह के प्यारे रसूल पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं, मुस्लमान और काफिर के बीच फर्क करने वाली चीज़ नमाज़ हैं। जिसने जान बुझ कर नमाज़ को छोड़ दिया गोया उसने काफिर का काम किया। एक और हदीस में प्यारे रसूल पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं, एक रात मेरे पास दो फ़रिश्ते आये और मुझे अपने साथ लेकर गए। मैंने रास्ते में देखा की एक आदमी ज़मीन पर लेटा हुआ हैं, और एक दूसरा आदमी एक बड़े पत्थर से उसे मार रहा हैं। उसका सिर टुकड़े टुकड़े हो जाता हैं। और पत्थर दूर जा गिरता हैं। जब वह पत्थर लेने के लिए जाता और वापिस आता हैं। इतनी देर में उसका सिर फिर सही हो जाता हैं। वह आदमी फिर अपनी पूरी ताकत से उसके सिर पर पत्थर मारता हैं। इसी तरह वह मारता रहता हैं। मैंने फ़रिश्ते से पूछा यह कौन आदमी हैं? इसका जुर्म क्या हैं? फ़रिश्ते ने जवाब दिया, यह आदमी नमाज़ नहीं पढता था। इसको इसकी सज़ा मिल रही हैं।

प्यारे दीनी भाइयो गौर करो, मस्जिदों में अज़ान की आवाज़ हमारे कानो तक पहुँचती हैं, लेकिन हम सारा काम काज छोड़ कर मस्जिद पहुंचने के बजाय आराम से बैठे टेलीविज़न देखते रहते हैं। अज़ान हो रही होती हैं और हमारा टेलीविज़न चल रहा होता हैं। नमाज़ हो रही हैं और हम फिल्मे, गाने, कार्यक्रम देखने में खोये रहते हैं। जमाअत हो रही होती हैं और हम सड़को, होटलो, चौराहों पर बैठे गप्पे मार रहे होते हैं। न तो हमें अज़ान और नमाज़ की परवाह हैं, और न ही मस्जिद का एहतराम होता हैं।

ताज्जुब की बात तो यह की रमज़ान के महीने में तक ऐसा देखना को मिलता हैं। कुछ लोग इस्लामी लिबास पहन कर घर से निकल जाते हैं लेकिन मस्जिद में नमाज़ पढ़ने की बजाय किसी और महफ़िल में लगे रहते हैं, और वहाँ फ़िज़ूल की दुनियावी बातें करते हैं।

हज़रत औबादा सहाबी फरमाते हैं,अल्लाह के रसूल पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझे 7 चीज़ो की नसीहत फ़रमाई थी। जिसमे से दो चीज़े यह हैं की -शिर्क मत करना नहीं तो तुम्हारे बदन की बोटी बोटी कर दी जाएगी। दूसरा जान बुझ कर नमाज़ न छोड़ना, क्यूंकि ऐसा आदमी इस्लाम से ख़ारिज हो जाता हैं।

ज़रा गौर करो ऐ मुसलमानो जान बुझ कर नमाज़ छोड़ने वाले हम कैसे मुस्लमान कहलाने के हक़दार हो सकते हैं। जब कभी लड़ने की बात आती हैं तो हम पीछे नहीं रहते लेकिन दीन के कामो से दूर क्यों? अल्लाह के वास्ते ऐ मुसलमानो अपना और नमाज़ का रिश्ता मज़बूत कर लो। मस्जिदों को अपने सजदों से आबाद कर दो। अब भी मौका हैं सच्चे दिल से तौबा करके अपने रब को राज़ी कर लो क्यूंकि अगर रब राज़ी हो गया तो दुनिया की कोई भी मुसीबत तुम पर नहीं आ सकती। गरीबी, बेरोज़गारी, मुसीबतो, रंज और गम लाचारी का एक ही इलाज हैं और वो हैं नमाज़ ।

अल्लाह हम सब को पंजवक्ता नमाज़ पढ़ने की तौफीक अता फरमाए आमीन।

जहन्नम में अल्लाह का अज़ाब (Jahannam Me Allah Ka Azab)

जहन्नम में अल्लाह का अज़ाब (Jahannam Me Allah Ka Azab)

खुनी दरिया का अज़ाब
कुछ जहन्नम वालों को खून के दरिया में डाल दिया जायेगा। तो वह जहन्नमी तैरते हुए किनारे तक आएंगे। उस वक़्त एक फरिश्ता एक बड़ा पत्थर इस ज़ोर से उनके मुँह पर मारेगा की वह फिर बीच दरिया में पहुंच जायेंगे। बार बार उन्हें यही अज़ाब दिया जाता रहेगा। यह वह लोग होंगे जो सूद(ब्याज) की कमाई खाते थे।
बुख़ारी शरीफ I 185

गलफड़े चीरने का अज़ाब
कुछ लोगो को फ़रिश्ते जहन्नम में सुलाकर उनके मुँह में संडासी डालेंगे। और उसे फैलाएंगे तो सिर के पीछे तक उनका मुँह फट जायेगा। इसी तरह दूसरा गलफड़ा भी फाड़ेंगे इतनी देर में पहला वाला सही होकर अपनी जगह आ जायेगा तो फिर उसे फाड़ेंगे। इसी तरह यह अज़ाब चलता रहेगा। यह सज़ा झूट बोलने वालों को मिलेगी।   बुख़ारी शरीफ I 185

पत्थर मारने का अज़ाब 
कुछ जहन्नमियों को फ़रिश्ते सुलाकर उनके सिर पर ज़ोर ज़ोर से पत्थर मारेंगे। इतना ज़ोर से की उनका सिर चूर चूर हो जायेगा और पत्थर दूर जा गिरेगा। जब फरिश्ता पत्थर उठाने जायेगा और वापिस आने तक जहन्नमी का सिर ठीक हो चूका होगा। फिर उसी तरह पत्थर मारकर सिर कुचल देगा लगातार यही अज़ाब होता रहेगा।    बुख़ारी शरीफ I 185

मुँह नोचने का अज़ाब
मेराज की रात प्यारे रसूल पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जन्नत जहन्नम की सेर करते हुए गुज़र रहे थे। आपने देखा की जहन्नम में कुछ लोग ताम्बे के नाखूनों से अपना सीना और चेहरा नोच रहे है। आपने हज़रत जिब्राइल से जब उनके बारे में पूछा तो उन्होंने बताया की यह लोगो की ग़ीबत करने वाले उनकी इज़्ज़त से खेलने वाले वाले लोग हैं। जिसकी सजा इन्हे मिल रही हैं।     मिश्कात II 429

सांप बिच्छू का अज़ाब 
हदीस शरीफ में हैं जहन्नम में ऊँटो के बराबर बड़े बड़े सांप हैं। वह इतने ज़हरीले होंगे की एक बार काटेंगे तो 40 साल तक ज़हर के दर्द का असर खत्म नहीं होगा। इसके अलावा वहाँ खच्चर जितने बड़े बिच्छू होंगे जो डांक मारते रहेंगे। उनके एक बार डंक मारने की तकलीफ भी 40 बरस तक रहेगी।
कुछ जहन्नमियों के गले में सांपो की माला पहना दी जाएगी यह ज़हरीले सांप उन्हें बराबर काटते रहेंगे।     मिश्कात II 429

हलक में फंसने वाले खानो का अज़ाब 
कुछ जहन्नमियों को हलक में फंसने वाला खाना खिलाया जायेगा। उससे उनका दम घुटने लगेगा तो वह पानी मांगेंगे। उस वक़्त उनके सामने इतना गर्म पानी पेश किया जायेगा की मुँह के करीब बर्तन के पहुचंते ही उसकी गर्मी से चेहरे की पूरी खाल पिघलकर कर उस बर्तन में गिर पड़ेगी।              मिश्कात II 504

क़ुरान मजीद में हैं की दोज़ख वालों को थूहड़ खिलाया जायेगा। वह इतना बदबूदार होगा की अगर एक कतरा दुनिया में गिर जाये तो खाने पीने की सारी चीज़े कड़वी व बदबूदार हो जाये।

गर्म पानी और पीप का अज़ाब 
जहन्नम वालों को गर्म पानी जो जैतून के तेल की तलहट की तरह गन्दा होगा। वह उन्हें पीना पड़ेगा जो मुँह के करीब लाते ही चेहरे की पूरी खाल को पिघला कर गिरा देगा। यही गर्म पानी उनके सिर पर डाला जायेगा। तो वह बदन में पहुंच कर अंदर के सारे हिस्सों को काट काट कर निचे गिरा देगा। इसी तरह कुछ जहन्नमियों को बदन का पीप पिलाया जायेगा। वह इतना बदबूदार होगा की अगर उसकी एक बूँद दुनिया में गिर जाये तो सारी दुनिया बदबू से मर जाये।      मिश्कात II 503

खुलासा यह है की जहन्नम में तरह तरह के अज़ाबो के साथ सज़ाये दी जाएगी। जिस तरह जन्नत की नेमतों को न किसी आँख ने देखा और न किसी कान ने सुना और न ही किसी के दिल में उसके बारे में ख्याल गुज़रा हैं। उसी तरह जहन्नम के अज़ाबो को भी न किसी ने कभी आंख से देखा और न ही किसी कान ने सुना और न ही किसी के दिल में इसका ख्याल आया। यह सब चीज़े मौत के बाद ही देखने को मिलती हैं। दुनिया में मज़े से रह रहे लोगो को इसका बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं हैं की मौत के बाद क्या होगा। वह बस अपनी छोटी से ज़िन्दगी मक्कारी, बुराई, ग़ीबत, नाफ़रमानीं में जीने में लगे हैं।

आजकल के लोग पैसा कमाने के चक्कर में किस तरह की गलत काम कर रहे हैं। अपने मज़े के लिए किस हद तक जा रहे हैं। इसका अज़ाब उनको इस ज़िन्दगी के बाद ज़रूर मिलेगा। अल्लाह हमें ऐसे कामो से दूर रखे जो काम सीधे जहन्नम की और ले जाते हैं। मेहरबानी करके अल्लाह के बताये रास्ते पर चलिए।  जिससे हमें जहन्नम के अज़ाब से छुटकारा मिल सके और जन्नत की खूबसूरत आबो हवा में साँस लेने का मौका मिले आमीन।

पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम (Prophet Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam)

पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम (Prophet Muhammad Sallallahu Alaihi Wasallam)

पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रबीउल अव्वल महीने की 12 तारीख 571 ईस्वी में सऊदी अरब के मक्का में पैदा हुए। आपके पिता का नाम अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुतलिब और माँ का नाम बीबी आमिना था। आप बचपन से ही अल्लाह की इबादत में मसरूफ़ रहते थे। आप पर ही पवित्र पुस्तक क़ुरान उतारी गयी। 40 साल की उम्र में आपको अल्लाह की और से एक पैगाम हासिल हुआ। जिसमे अल्लाह ने आपको कहा की तुम दुनिया में हो रही बुराइयों को मिटाओ लोगो को समझाओ उनको गुमराही से बचाओ। आपने अल्लाह के इस हुक्म को कबूल किया और उस पर खरा उतरने का वादा किया। तभी से उन्हें नबूवत हासिल हुई। आपकी वफ़ात भी रबीउल अव्वल महीने की 12 तारीख 632 ईस्वी को तेज़ बुखार की वजह से हुई। वफ़ात के वक़्त आप 62 साल के थे।

पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस्लाम धर्म के संस्थापक है। उस दौर में अरब में लोगो का बहुत बुरा हाल था। उस वक़्त वहां हर वर्ग का अपना अलग धर्म था। और उनके अलग अलग तरह के देवी देवता थे। कोई मूर्ति को पूजता था, तो कोई ताकतवर बादशाहो को अपना भगवान मानता था। कोई जानवरो को पूजता था तो कोई शैतानो को सबके अपने अलग अलग देवता थे। इसके अलावा वहाँ हिंसक भावना सभी लोगो में थी। सभी एक दूसरे के दुश्मन उनके खून के प्यासे थे। वहां कोई भी सुरक्षित नहीं था। औरते और बच्चे तक महफूज़ नहीं थे। इस बुरे दौर को खत्म करने के लिए अल्लाह ने पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को पैग़म्बर बनाया।

दुनिया की हज़ारो साल पुरानी आबादी में हज़ारो नबी व रसूल आये। अलग अलग लोगो ने अलग अलग अंदाज़ में पुराने धर्मो का प्रचार किया और फिर एक ऐसा भी दौर आया की लोग खुदा को भूल बैठे थे। और ताक़तवरो बादशाहो को ही खुदा मान बैठे थे। ऐसे बादशाहो ने भी अपनी खुदाई होने का दवा करना शुरू कर दिया था। दुनिया के ऐसे बिगड़े माहौल में अलग अलग वर्गों में बटी एक दूसरे के खून की प्यासी दुनिया हर ऐतबार से गुमराह हो चुकी थी। ऐसे वक़्त में इंसानियत की रहनुमाई के लिए पैगंबरे आज़म ताजदारे कायनात महबूबे परवरदिगार हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम इंसानियत की रहनुमाई के लिए दुनिया में तशरीफ़ लाये।

आपने लोगों से फ़रमाया ए दुनिया वालो में किसी एक कबीले खानदान मुल्क वालो का ही भला नहीं चाहता बल्कि मै तो पूरी दुनियाए इंसानियत की रहनुमाई के लिए अमन और रहमत का पैगाम लेकर आया हूँ। मेरे रब ने मुझे पूरी इंसानी बिरादरी की हिदायत के लिए भेजा हैं। मै तुम्हे इंसानियत का भुला सबक याद दिलाने आया हूँ।  मै तुम्हे अख़लाक़ व हिकमत की तालीम देने आया हूँ। आपने जो कुछ उस वक़्त फ़रमाया उस पर अमल करके दिखाया। आपने सब को इंसानियत की रस्सी में पिरोना चाहा। एक दूसरे को एक दूसरे का भाई बना कर मुहब्बत व भाई चारगी के रिश्ते में बांधना चाहा तो इसके लिए यह ज़रूरी था की लोगो की सोच एक तरफ लायी जाये। उनको एक अल्लाह की इबादत की और लाया जाये मतलब यह था की अगर सारे लोग एक ही माबूद की इबादत करेंगे तो ही एक बनकर रहने का सबक सीखेंगे।

लोगो को इंसानियत व भाई चारगी की बुनियादो पर जमा करने के लिए आपने जात पात की दीवारों को खत्म फरमा दिया। काले गोरे के फ़र्क़ को मिटा दिया। अरबी आज़मी का फ़र्क़ खत्म फ़रमा कर सब को इस्लाम की लाइन में खड़ा कर दिया। आपने इस्लाम का पैगाम भटके हुए लोगो तक पहुंचाया वो लोग जो ताकतवर बादशाहो को ही खुदा समझ बैठे थे। आपने लोगो को समझाया की दौलत, शोहरत, बादशाही होने से कोई इज़्ज़तदार नहीं बन सकता। इंसान अपनी सलाहियत और शौक के मुताबिक रोज़ी रोटी के लिए जो पेशा अपनाना चाहे अपना सकता हैं। किसी के आगे झुकने और ज़ुल्म सहने की ज़रूरत नहीं हैं। उन्होंने लोगो से यह भी फ़रमाया की हलाल कमाई के लिए किसी काम को छोटा ना समझा जाये और किसी भी पेशे के वजह से किसी को बड़ा या छोटा ना समझा जाये। ऐसा सोचना इंसानियत और इस्लामी तालीम के खिलाफ हैं।

सबको देने वाला सबका परवरदिगार अल्लाह हैं। दुनिया व आख़िरत की बादशाही अल्लाह के लिए हैं। उसके अलावा कोई बादशाह नहीं हो सकता, जिसके सामने तुम झुको और सर झुकाओ। अल्लाह जिसे चाहे अपने बन्दों की खिदमत के लिए हुकूमत बादशाहत अता फ़रमा दे। आपने उस वक़्त ऐसे तमाम बादशाह जो लोगो पर ज़ुल्म करते आ रहे थे। उन्हें अल्लाह का खौफ और अज़ाब बताया और दुनियावी व आख़िरत की तबाही का खौफ बताया। आपने गुलामो को आज़ाद करने की ताकीद फ़रमाई और गुलामो को आज़ाद करने को बहुत बड़ा सवाब करार दिया। आपकी ऐसी ही कोशिशों से सैंकड़ों गुलाम आज़ादी की ज़िन्दगी जीने लगे। बड़े बड़े बादशाह जो खुदा होने का दावा कर रहे थे वो एक ही अल्लाह की इबादत में लग गए और फिर धीरे धीरे गुलाम खरीदने और बेचने की रस्म खत्म हो गयी।

आपने दौलत मंद लोगो से फ़रमाया की अल्लाह ने तुम्हे माल व दौलत से नवाज़ा हैं तो याद रखो की तुम्हे अल्लाह की उस अमानत का हक़ अदा करना हैं। तुम्हे उस दौलत को उसी तरीके से इस्तेमाल करना हैं जिसकी इजाज़त अल्लाह ने तुम्हे दे रखी हैं। अगर तुम दौलत का गलत इस्तेमाल करोगे तो कंगाल हो जाने के साथ साथ तरह तरह के गुनाह बीमारियों और सज़ाओ के हक़दार भी बनोगे। इसी लिए इस्लाम में माल जमा रखने की नहीं बल्कि उसका इस्तेमाल करने की ताकीद की गयी हैं। मतलब सदक़ा, खैरात करो अपने बच्चो की अच्छे से परवरिश करो अपना कारोबार बढ़ाओ, अल्लाह की राह में उस के ज़रूरत बन्दों पर खर्च करो, माल दबा कर ना बैठ जाओ। आपकी वफ़ात के के बाद पुरे अरब में लोग ईमान लाये। आपकी बदौलत पुरे अरब में इस्लाम का परचम फैला जो आज पूरी दुनिया में कायम हैं।

पैगंबरे इस्लाम मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो की इन्ही मुबारक तालीमात पर मुसलमान अमल करे और खुशहाल रहे आमीन। 

रमज़ान और रोज़ा क्या हैं? (What is Ramzan and Roza)

रमज़ान और रोज़ा क्या हैं? (What is Ramzan and Roza)
रमज़ान और रोज़ा क्या हैं? (What is Ramzan and Roza)

इस्लामी कैलेंडर के नौवे महीने को रमज़ान का महीना कहा जाता हैं। यह महीना मुसलमानो के लिए एक पवित्र महीना माना जाता हैं। यह महीना इबादत का महीना कहलाता हैं। इस महीने में मुसलमान रोज़ा (उपवास) रखता हैं, खुदा की इबादत करता हैं, क़ुरान पढता हैं, ज़कात अदा करता हैं, और नमाज़ की पाबन्दी करता हैं। इस महीने में हर मुसलमान को हिदायत दी जाती हैं की वो वह पुरे रमज़ान में रोज़ा रखे, पाबन्दी से पांच वक़्त की नमाज़ अदा करे, गलत आदतों से दूर रहे और नेक काम करे। रोज़ा इस्लाम की पांच प्रमुख स्तम्भों में से एक स्तंम्भ हैं।

रोज़ा क्या हैं?

रोज़ा एक ऐसी इबादत है, जो मुसलमान मर्द औरत पर फ़र्ज़ है। अल्लाह के प्यारे रसूल फरमाते हैं जिसने अल्लाह के वास्ते सवाब की नियत से रमज़ान के रोज़े रखे उसके गुनाह बख्श दिए जाएंगे। इससे बड़ी और क्या बात हो सकती है कि बन्दे के गुनाह बक्श दिए जाए और उसे जन्नत की बशारत मिल जाए।
अगर किसी मजबूरी बीमारी की वजह से कोई रोज़ा न रख सके तो ईद के बाद इसकी कज़ा रखना भी फ़र्ज़ है।

फजर का वक्त होने से पहले और सूरज डूबने तक खाने पीने और हमबिस्तरी,गन्दी बुरी ज़बान, बुरी नज़र से बचे रहने को रोज़ा कहा जाता है। लेकिन यह सब अल्लाह की रज़ा और उसके हुक्म पर अमल करने की नियत से होना चाहिए ताकि मकसद पूरा हो सके।

अगर किसी ने रोज़ा रखने की नियत कर ली लेकिन दुआ नहीं पढ़ी तो भी उसका रोज़ा हो जाएगा। नियत के लिए अरबी दुआ व बिसोमि गदिन नवई तु मिन शहरि रमज़ान हाज़ा पढ़ ले तो अच्छा है अगर यह नहीं पढ़ा और अपनी ज़बान से यह कह लिया कि मैं अल्लाह के वास्ते कल रोज़ा रखने की नियत करता हूं तो भी काफी है। रात में रोज़ा रखने की नियत नहीं की सुबह कुछ खाया पिया नहीं और दिन चढ़े सोचा कि रोज़ा रखना है तो अब भी उसकी नियत हो जाएगी और रोज़ा हो जाएगा।

सेहरी भी रोज़ा रखने की नियत ही है लेकिन अगर किसी दिन सेहरी नहीं की देर से उठने की वजह से वक्त खत्म हो चुका था तो भी रोज़ा रखने की नियत कर ले रोज़ा हो जाएगा। सेहरी छूट जाने की वजह से रोज़ा छोड़ देना गुनाह है।

सहरी के वक्त कुछ खाना पीना सुन्नत हैं। अल्लाह के प्यारे रसूल सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने इसकी सख्त ताकीद फ़रमाई है। ज़्यादा ना खा सके तो दो चार खजूरे,छुहारे ही खाकर पानी पी ले सेहरी ना करने से जिस्म में कमजोरी आती है।

सेहरी के वक्त का खास ध्यान रखे। वक़्त खत्म होने से पहले जो खाना चाहते हैं वह खा ले। खाने के बाद पानी से कुल्ली करके मुंह साफ कर ले।
 अगर आंख देर से खुली और सेहरी का वक़्त अगर ख़त्म हो गया उसके बावजूद खा पी लिया तो अब रोज़ा नहीं होगा और यह खाना भी उसके लिए मकरूह होगा। रमज़ान का रोज़ा ऐसी हालत में बिना सेहरी के भी हो जाएगा।

इस तरह रोज़ा खोलने के वक्त का भी काफी खास ख्याल रखना ज़रूरी है। घड़ी वगैरा पर ज्यादा भरोसा करना अच्छा नहीं बल्कि सूरज डूब जाने का यकीन हो जाना भी ज़रूरी है। जल्दी के चक्कर में अगर सूरज डूबने से दो 4 मिनट पहले ही रोज़ा खोल दिया तो रोज़ा नहीं होगा बल्कि उसकी कज़ा लाज़िम होगी। जब तक सूरज के डूबने में शक हो रोज़ा खोलना जायज़ नहीं वक्त हो जाए तो बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम से और इफ्तार की दुआ अल्लाहुम्मा इन्नी लाका सुमतो व बिका अमन्तु व अलैका तवक्कलतो व अला रिज़्क़ीक़ा अफ्तरतु पढ़कर रोज़ा खोले।

रोज़ा एक फ़र्ज़ इबादत हैं, जिसके बहुत सारे फायदे हैं। दुनिया में भी और आखिरत में भी अल्लाह के रसूल ने फरमाया जिसने ईमान की हालत में सवाब की नियत से रमज़ान के रोज़े रखे उसके पिछले गुनाह माफ कर दिए जाएंगे।
इस महीने में मोमिन की नेकियों का सवाब 100 से 700 गुना तक बढ़ा दिया जाता है। अल्लाह ने फरमाया रोज़ा मेरे लिए है और मैं ही उसका बदला अता करूंगा।

रमज़ान के महीने में अल्लाह की तरफ से रहमतों की बरसात होती है। अल्लाह पाक रोज़ाना इफ्तार के वक़्त ऐसे 10 लाख  गुनाहगारों को जहन्नम से आज़ाद फरमा देता है।  जिनके लिए जहन्नम के अज़ाब  का हुक्म हो चुका होता है। इसी तरह जुमा की रात और दिन के हर हर पहर में ऐसे 10 लाख गुनाहगारों को जहन्नम के अज़ाब से बरी कर दिया जाता है। जो जहन्नम की सजा के हकदार करार पा चुके होते हैं। और फिर रमज़ान के आखिरी दिन पूरे महीने में आज़ाद किए जाने वालों के बराबर और आज़ाद कर दिए जाते हैं।

जैसा की आप सबको पता है कि रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ हैं, पर साथ ही साथ रमज़ान के महीने का एहतराम करना भी ज़रूरी है। रमज़ान की तौहीन और बेकद्री बहुत बड़ी महरूमी है। जो लोग रमज़ान के रोज़े नहीं रखते ऊपर से उसकी बेहुरमती भी करते हैं। खुले आम खाते पीते हैं। फिल्मो नाच-गानों अय्याशी में खोये रहते हैं। वह दुनिया व आखिरत में भयानक अज़ाब के शिकार होंगे। हजरत अब्दुल्ला बिन अब्बास रदियल्लाहो अन्हो का बयान है कि अल्लाह के रसूल ने फरमाया जिस ने बिना किसी शरई मजबूरी के रमज़ान का एक भी रोज़ा छोड़ दिया तो वह 9 लाख साल तक जहन्नम की आग में जलता रहेगा। इसलिए ऐ मुसलमानों अल्लाह के वास्ते अपने गुनाहों से तौबा करने में जल्दी करें और फिर नमाज रोजे के पाबंद बन जाए। अल्लाह हम सबको रमजान में रोजे रखने और नमाज की पाबंदी रखने की तौफीक अता फरमाए आमीन।  

इस्लाम में रसूल और नबी कौन हैं? Who is Rasool and Nabi in Islam?

इस्लाम में रसूल और नबी कौन हैं? Who is Rasool and Nabi in Islam?
इस्लाम में रसूल और नबी कौन हैं? Who is Rasool and Nabi in Islam?

इंसानों की हिदायत व रहनुमाई और उन तक अपना पैगाम पहुंचाने के लिए अल्लाह पाक अपने जिन महबूब बन्दों को मुकर्रर व मुन्तख़ब फरमाता हैं  उन्हें नबी,रसूल, पैगंबर कहा जाता है। अल्लाह के यह महबूब बड़ी दयानतदारी व इमानदारी से उसका पैगाम लोगों तक पहुंचाते हैं। यह मर्तबा अल्लाह ने जिसे चाहा अता फ़रमाया। कोई आदमी अपनी मेहनत या कोशिश से नबी नहीं हो सकता। दुनिया का कोई इंसान किसी नबी के बराबर नहीं हो सकता। अगर कोई आदमी ऐसा कहे तो वह काफीर हैं।

इंसानों की हिदायत के लिए जो नबी तशरीफ लाए वह इंसान और मर्द थे। कोई औरत नबी या रसूल नहीं हुई। यह शरफ़ अल्लाह ने मर्दों को बख्शा। नबी व रसूल अल्लाह के तर्जमान होते हैं जो उस का पैगाम हम तक पहुंचाते हैं और बयान करते हैं। अल्लाह पाक जो हुक्म हमारे लिए भेजता है नबी उसे बयान फरमाते और खुद भी उस पर अमल करते हैं।

अल्लाह ने हर कौम में, हर मुल्क में अपने नबी व रसूल भेजें। क़यामत के दिन कोई कौम यह नहीं कह सकेगी कि हमारी हिदायत के लिए कोई नबी नहीं आया। जिनकी किस्मत में ईमान लिखा जा चुका था, वह मोमिन हुए। नुबूवत व रिसालत का यह सिलसिला हमारे प्यारे नबी हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम पर खत्म हो गया। आप के बाद अब कोई नबी नहीं आएगा। अगर कोई आदमी अपने नबी होने का ऐलान करें या अकीदा रखें कि पैगंबरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के बाद भी नबी आ सकता है, या आएगा तो ऐसा आदमी काफीर है क्योंकि कुरान मजीद में अल्लाह पाक ने हमारे प्यारे रसूल को खातमुन्नबिईंन(Khatam-Un-Nabiyeen) फरमाया है।

माना कि हम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की उम्मत में है, उनका कलमा पढ़ते हैं, उनकी शरीयत पर अमल करते हैं, फिर भी हमें उन सारे नबियों रसूलों पर ईमान लाना ज़रूरी है जो आप से पहले तशरीफ़ ला चुके हैं। कहा जाता है कि एक लाख चौबीस हज़ार या दो लाख चौबीस हज़ार या कुछ कम  ज़्यादा नबी दुनिया में तशरीफ़ लाएं जिनमें से कुरान व हदीस में कुछ ही नबियो के बयान मौजूद है। फिर भी उनके अलावा हमें उन दूसरे नबियों रसूलों पर भी उसी तरह ईमान लाना, उन्हें नबी रसूल तस्लीम(स्वीकार) करना ज़रूरी है जिस तरह हम पैगंबरे इस्लाम को तस्लीम(स्वीकार) करते हैं।

हमें उन सारे नबियों-रसूलो पर ईमान लाना ज़रूरी है, जो दुनिया में हिदायत व तब्लीग के लिए भेजे गए। उनमें से किसी एक का भी इनकार करने वाला ईमान से ख़ारिज है। हम ईसाई नहीं फिर भी हमें हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को रसूल मानना ज़रूरी है। यह अलग बात है कि उन्हें मानने का दावा करने वाले लोग अपने नबी की तालीम व तब्लीग से दूर होने की वजह से गुमराह हो गए लेकिन हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की नुबूवत व रिसालत में तो कोई फर्क नहीं आया। वह अब भी नबी है।

उनके बारे में ईसाइयों का अक़ीदा है की वह उनकी बख्शीश के लिए सूली पर चढ़ गए, फांसी दे दिए गए, जबकि हमारा अकीदा है कि अल्लाह ने उन्हें जिंदा आसमान पर उठा लिया। और उन्हें कत्ल करने के लिए  लोगों ने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम जैसी शक्ल वाले अपने ही किसी दूसरे आदमी को कत्ल कर डाला। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम कयामत के करीब वापस दुनिया में तशरीफ़ लाएंगे।

इसी तरह हम यहूदी नहीं फिर भी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह का नबी व रसूल मानते हैं। भले ही आज उनकी कौम गुमराह हो चुकी है। बहरहाल हमें अल्लाह के हर नबी रसूल पर ईमान लाना ज़रूरी है। सारे नबियों-रसूलो ने लोगो को इस्लाम की ही दावत दी। एक अल्लाह की इबादत का पैगाम दिया। इसलिए उनमें से किसी वजह से किसी एक का भी इनकार गोया सब का इनकार है। किसी की तौहीन सब की तौहीन है। हम रहमते आलम सल्लल्लाहो अलैहि  वसल्लम के उम्मती है। हमे अपने प्यारे रसूल की इज़्ज़त करना ज़रूरी है। ऐसा नहीं होना चाहिए की हम अपने नबी के अलावा दूसरे नबियों को कम समझे।

हमारे लिए मुस्तफा जाने रहमत सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की शरीयत पर अमल करना और उनकी सुन्नतों की रोशनी में अपनी जिंदगी गुज़ारना लाज़िम हैं क्योंकि आपके हुक्म पर अमल करना, आपकी फरमाबरदारी करना गोया अल्लाह की फरमाबरदारी करना है। हमारे नबी अपनी मर्ज़ी से कुछ नहीं फरमाते बल्कि जो अल्लाह हुक्म देता है वही फरमाते हैं।

नबी व रसूल कबीले एहतराम हस्तियां हैं। उनकी ताज़ीम फ़र्ज़ हैं और तौहीन कुफ्र हैं। आदमी चाहे जितने नेक काम करे अगर वह रसूल की शान में गुस्ताखी करे तो उसका किया धरा सब बेकार हैं। इसलिए हमे अपने नबियों रसूलो का एहतराम करना ज़रूरी हैं। अगर कोई शख्स नबी की किसी पसंद को नापसंद कहे तो वह शख्स सज़ा का हक़दार हैं।

नबी तो हमें अपनी जान से भी ज़यादा प्यारे होने चाहिए वरना ईमान मुकम्मल नहीं होगा। यही तालीम अल्लाह ने क़ुरान मजीद में अपने बन्दों को दी हैं।अल्लाह हम सब को रसूलो-नबियों के फरमान पर,उनके बताये रास्ते पर चलने की तौफीक अता फरमाए आमीन। 

शब-ए-बरात क्या हैं? (What is Shab-e-Barat)

शब-ए-बरात क्या हैं? (What is Shab-e-Barat)
What is Shab-e-barat?
शाबान इस्लामी साल का आठवां महीना है। शाबान का मतलब है जमा करना और अलग करना। अल्लाह के प्यारे रसूल फरमाते हैं, शाबान मेरा महीना है, रज्जब अल्लाह का महीना है और रमजान मेरी उम्मत का महीना है। शाबान गुनाहों को मिटाने वाला और रमजान पाक करने वाला महीना है।

अल्लाह के रसूल रमज़ान के बाद सबसे ज़्यादा रोज़े शाबान महीने में रखा करते थे। शाबान महीने की 15 वी रात को शबे बरात कहा जाता है। बरात का मतलब है बरी होना,आजाद होना। चूँकि यह रात अपने गुनाहों से तौबा करके अल्लाह के फ़ज़्ल से जहन्नम के अज़ाब से आजाद होने की रात है इसलिए इसे शबे बरात कहा जाता है।  इसे बरकत वाली रात, दोज़ख से निजात पाने वाली रात और रहमत वाली रात भी कहा जाता है। इस रात के बारे में उम्मुल  मोमिनीन हज़रत बीबी आयशा सिद्दीका को बताते हुए अल्लाह के रसूल ने फरमाया की इस रात अगले साल जितने भी पैदा होने वाले होते हैं वह इस रात लिख दिए जाते हैं और जितने लोग इस साल मरने वाले होते हैं वह भी इस रात लिख दिए जाते हैं। इस रात में लोगों के साल भर के आमाल उठा लिए जाते हैं और इसी रात साल भर की मुकर्रर रोज़ी उतार दी जाती है।

अल्लाह पाक इस रात अपनी रहमत से अपने बंदों को बख्श देता है। लेकिन शिर्क करने वाले,अपने भाई से दुश्मनी रखने वालों को नहीं बक्शता इस रात तौबा करने वालो की तौबा काबुल की जाती हैं। रोज़ी में बरकत की दुआ करने वालो की रोज़ी में बरकत अता की जाती हैं। बीमारों के लिए दुआ मांगने पर बीमारों को बीमारी से शिफा दी जाती हैं।

इस रात कब्रिस्तान जाना फातिहा पढ़ना इसाले सवाब करना और दुआए मगफिरत करना सुन्नत है। हदीस शरीफ में है, जो आदमी 11 बार कुल हुवल्लाह शरीफ पढ़ कर उसका सवाब मुर्दो की रूहों को पहुंचाएं तो मुर्दों को सवाब पहुँचाने के साथ ही पढ़ने वाले को मुर्दो की तादात के बराबर सवाब मिलेगा। इस रात बेरी के 7 पत्ते पानी में उबालकर उस पानी से नहाए तो इंशाल्लाह साल भर तक जादू टोने के असर से महफूज़ रहेगा।

इस रात तीन काम करने चाहिए,
1.कब्रस्तान जाकर मुर्दों के लिए इस वाले सवाल और दुआए मगफिरत की जाए।
 2.यह रात नफिल नमाज पढ़ने तिलावत करने और दुरूद व दुआ पढ़ने के साथ अपने गुनाहों से तौबा करने में बितायी जाए ताकि अल्लाह की रेहमत हमारे गुनाहों पर पर्दा डालकर हमें दोज़ख की आग से बरी होने का हकदार बना दे।
 3.रात इबादत में गुजारने के बाद दिन में रोजा रखा जाए यह सुन्नत है।

इसके अलावा इसाले सवाब के लिए कुछ मीठी चीजें बनवाना फातिहा लगवाना खाना खिलाना व तोहफे पेश करने में कोई हर्ज नहीं लेकिन इसे पटाखों का त्यौहार समझना नादानी है जो सरासर नाजायज़ और हराम है। इस रात में अल्लाह पाक बनी कलब की बकरियों के बाल की तादात के बराबर गुनाहगारों को जहन्नम से आज़ाद फरमा देता है। लेकिन काफिर, दुश्मनी रखने वाले, रिश्ता तोड़ने वाले, मां बाप की नाफरमानी करने वाले और शराब पीने वालों पर रहम नहीं फरमाता। ऐसे लोगों की बख्शीश नहीं होती।

इस रात का फैज़ हासिल करने के लिए चाहिए कि अपने गुनाहों से सच्ची तौबा करें, अगर मां-बाप नाराज़ है तो उन्हें खुश किया जाए क्योंकि जब तक वह राज़ी नहीं होंगे तब तक अल्लाह राज़ी नहीं होगा। किसी दिनी भाई से मनमुटाव हो गया हो या सलाम कलाम बंद हो तो मेल मिलाप करके गलतफहमी दूर करके इसका बहाल किया जाए फिर अपने रब से रहम व करम और मगफिरत की भीख मांगी जाये इस यकीन के साथ की अल्लाह पाक हमें भी इसके फैज़ से मालामाल फरमाएगा।

इस रात में इबादत करने का सवाब दूसरी रातो के मुकाबले ज्यादा मिलता है। एक हदीस में है जो आदमी इस रात 100 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े अल्लाह उसके पास 100 फरिश्ते भेजेगा उनमें से 30 फरिश्ते उसे जन्नत की बशारत सुनाएंगे। 30 फरिश्ते उसे दोज़ख के अज़ाब से महफूज रहने की खुशखबरी देंगे और 30 फ़रिश्ते उसे दुनियावी बलाओं और मुसीबतों से बचाएंगे और 10 फ़रिश्ते शैतान के वसवसे और धोखे से बचाएंगे। इस रात मुस्तफा जाने रेहमत सल्ललाहो अलैहि वस्सलम की उम्मत पर अल्लाह की खास रहमतें नाज़िल होती है।

यह रात तौबा इस्तिगफार की रात है इसलिए हमें चाहिए कि हम इसकी कद्र करें इसकी अहमियत समझे और अपने गुनाहों से माफी मांगे,तौबा करे और  तौबा पर कायम रहने की नियत भी रखें।

सदक़ा और खैरात क्या हैं? (What is Sadqa and khairat)

ज़कात फ़ितरा के अलावा नफ्ली तौर पर इबादत की नियत से अल्लाह की रज़ा के लिए अल्लाह के बन्दों के लिए हम जो कुछ खर्च करते हैं, उसे सदक़ा खैरात ...