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इस्लाम में रसूल और नबी कौन हैं? Who is Rasool and Nabi in Islam?

इस्लाम में रसूल और नबी कौन हैं? Who is Rasool and Nabi in Islam?
इस्लाम में रसूल और नबी कौन हैं? Who is Rasool and Nabi in Islam?

इंसानों की हिदायत व रहनुमाई और उन तक अपना पैगाम पहुंचाने के लिए अल्लाह पाक अपने जिन महबूब बन्दों को मुकर्रर व मुन्तख़ब फरमाता हैं  उन्हें नबी,रसूल, पैगंबर कहा जाता है। अल्लाह के यह महबूब बड़ी दयानतदारी व इमानदारी से उसका पैगाम लोगों तक पहुंचाते हैं। यह मर्तबा अल्लाह ने जिसे चाहा अता फ़रमाया। कोई आदमी अपनी मेहनत या कोशिश से नबी नहीं हो सकता। दुनिया का कोई इंसान किसी नबी के बराबर नहीं हो सकता। अगर कोई आदमी ऐसा कहे तो वह काफीर हैं।

इंसानों की हिदायत के लिए जो नबी तशरीफ लाए वह इंसान और मर्द थे। कोई औरत नबी या रसूल नहीं हुई। यह शरफ़ अल्लाह ने मर्दों को बख्शा। नबी व रसूल अल्लाह के तर्जमान होते हैं जो उस का पैगाम हम तक पहुंचाते हैं और बयान करते हैं। अल्लाह पाक जो हुक्म हमारे लिए भेजता है नबी उसे बयान फरमाते और खुद भी उस पर अमल करते हैं।

अल्लाह ने हर कौम में, हर मुल्क में अपने नबी व रसूल भेजें। क़यामत के दिन कोई कौम यह नहीं कह सकेगी कि हमारी हिदायत के लिए कोई नबी नहीं आया। जिनकी किस्मत में ईमान लिखा जा चुका था, वह मोमिन हुए। नुबूवत व रिसालत का यह सिलसिला हमारे प्यारे नबी हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि  वसल्लम पर खत्म हो गया। आप के बाद अब कोई नबी नहीं आएगा। अगर कोई आदमी अपने नबी होने का ऐलान करें या अकीदा रखें कि पैगंबरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के बाद भी नबी आ सकता है, या आएगा तो ऐसा आदमी काफीर है क्योंकि कुरान मजीद में अल्लाह पाक ने हमारे प्यारे रसूल को खातमुन्नबिईंन(Khatam-Un-Nabiyeen) फरमाया है।

माना कि हम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की उम्मत में है, उनका कलमा पढ़ते हैं, उनकी शरीयत पर अमल करते हैं, फिर भी हमें उन सारे नबियों रसूलों पर ईमान लाना ज़रूरी है जो आप से पहले तशरीफ़ ला चुके हैं। कहा जाता है कि एक लाख चौबीस हज़ार या दो लाख चौबीस हज़ार या कुछ कम  ज़्यादा नबी दुनिया में तशरीफ़ लाएं जिनमें से कुरान व हदीस में कुछ ही नबियो के बयान मौजूद है। फिर भी उनके अलावा हमें उन दूसरे नबियों रसूलों पर भी उसी तरह ईमान लाना, उन्हें नबी रसूल तस्लीम(स्वीकार) करना ज़रूरी है जिस तरह हम पैगंबरे इस्लाम को तस्लीम(स्वीकार) करते हैं।

हमें उन सारे नबियों-रसूलो पर ईमान लाना ज़रूरी है, जो दुनिया में हिदायत व तब्लीग के लिए भेजे गए। उनमें से किसी एक का भी इनकार करने वाला ईमान से ख़ारिज है। हम ईसाई नहीं फिर भी हमें हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को रसूल मानना ज़रूरी है। यह अलग बात है कि उन्हें मानने का दावा करने वाले लोग अपने नबी की तालीम व तब्लीग से दूर होने की वजह से गुमराह हो गए लेकिन हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की नुबूवत व रिसालत में तो कोई फर्क नहीं आया। वह अब भी नबी है।

उनके बारे में ईसाइयों का अक़ीदा है की वह उनकी बख्शीश के लिए सूली पर चढ़ गए, फांसी दे दिए गए, जबकि हमारा अकीदा है कि अल्लाह ने उन्हें जिंदा आसमान पर उठा लिया। और उन्हें कत्ल करने के लिए  लोगों ने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम जैसी शक्ल वाले अपने ही किसी दूसरे आदमी को कत्ल कर डाला। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम कयामत के करीब वापस दुनिया में तशरीफ़ लाएंगे।

इसी तरह हम यहूदी नहीं फिर भी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह का नबी व रसूल मानते हैं। भले ही आज उनकी कौम गुमराह हो चुकी है। बहरहाल हमें अल्लाह के हर नबी रसूल पर ईमान लाना ज़रूरी है। सारे नबियों-रसूलो ने लोगो को इस्लाम की ही दावत दी। एक अल्लाह की इबादत का पैगाम दिया। इसलिए उनमें से किसी वजह से किसी एक का भी इनकार गोया सब का इनकार है। किसी की तौहीन सब की तौहीन है। हम रहमते आलम सल्लल्लाहो अलैहि  वसल्लम के उम्मती है। हमे अपने प्यारे रसूल की इज़्ज़त करना ज़रूरी है। ऐसा नहीं होना चाहिए की हम अपने नबी के अलावा दूसरे नबियों को कम समझे।

हमारे लिए मुस्तफा जाने रहमत सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की शरीयत पर अमल करना और उनकी सुन्नतों की रोशनी में अपनी जिंदगी गुज़ारना लाज़िम हैं क्योंकि आपके हुक्म पर अमल करना, आपकी फरमाबरदारी करना गोया अल्लाह की फरमाबरदारी करना है। हमारे नबी अपनी मर्ज़ी से कुछ नहीं फरमाते बल्कि जो अल्लाह हुक्म देता है वही फरमाते हैं।

नबी व रसूल कबीले एहतराम हस्तियां हैं। उनकी ताज़ीम फ़र्ज़ हैं और तौहीन कुफ्र हैं। आदमी चाहे जितने नेक काम करे अगर वह रसूल की शान में गुस्ताखी करे तो उसका किया धरा सब बेकार हैं। इसलिए हमे अपने नबियों रसूलो का एहतराम करना ज़रूरी हैं। अगर कोई शख्स नबी की किसी पसंद को नापसंद कहे तो वह शख्स सज़ा का हक़दार हैं।

नबी तो हमें अपनी जान से भी ज़यादा प्यारे होने चाहिए वरना ईमान मुकम्मल नहीं होगा। यही तालीम अल्लाह ने क़ुरान मजीद में अपने बन्दों को दी हैं।अल्लाह हम सब को रसूलो-नबियों के फरमान पर,उनके बताये रास्ते पर चलने की तौफीक अता फरमाए आमीन। 

शब-ए-बरात क्या हैं? (What is Shab-e-Barat)

शब-ए-बरात क्या हैं? (What is Shab-e-Barat)
What is Shab-e-barat?
शाबान इस्लामी साल का आठवां महीना है। शाबान का मतलब है जमा करना और अलग करना। अल्लाह के प्यारे रसूल फरमाते हैं, शाबान मेरा महीना है, रज्जब अल्लाह का महीना है और रमजान मेरी उम्मत का महीना है। शाबान गुनाहों को मिटाने वाला और रमजान पाक करने वाला महीना है।

अल्लाह के रसूल रमज़ान के बाद सबसे ज़्यादा रोज़े शाबान महीने में रखा करते थे। शाबान महीने की 15 वी रात को शबे बरात कहा जाता है। बरात का मतलब है बरी होना,आजाद होना। चूँकि यह रात अपने गुनाहों से तौबा करके अल्लाह के फ़ज़्ल से जहन्नम के अज़ाब से आजाद होने की रात है इसलिए इसे शबे बरात कहा जाता है।  इसे बरकत वाली रात, दोज़ख से निजात पाने वाली रात और रहमत वाली रात भी कहा जाता है। इस रात के बारे में उम्मुल  मोमिनीन हज़रत बीबी आयशा सिद्दीका को बताते हुए अल्लाह के रसूल ने फरमाया की इस रात अगले साल जितने भी पैदा होने वाले होते हैं वह इस रात लिख दिए जाते हैं और जितने लोग इस साल मरने वाले होते हैं वह भी इस रात लिख दिए जाते हैं। इस रात में लोगों के साल भर के आमाल उठा लिए जाते हैं और इसी रात साल भर की मुकर्रर रोज़ी उतार दी जाती है।

अल्लाह पाक इस रात अपनी रहमत से अपने बंदों को बख्श देता है। लेकिन शिर्क करने वाले,अपने भाई से दुश्मनी रखने वालों को नहीं बक्शता इस रात तौबा करने वालो की तौबा काबुल की जाती हैं। रोज़ी में बरकत की दुआ करने वालो की रोज़ी में बरकत अता की जाती हैं। बीमारों के लिए दुआ मांगने पर बीमारों को बीमारी से शिफा दी जाती हैं।

इस रात कब्रिस्तान जाना फातिहा पढ़ना इसाले सवाब करना और दुआए मगफिरत करना सुन्नत है। हदीस शरीफ में है, जो आदमी 11 बार कुल हुवल्लाह शरीफ पढ़ कर उसका सवाब मुर्दो की रूहों को पहुंचाएं तो मुर्दों को सवाब पहुँचाने के साथ ही पढ़ने वाले को मुर्दो की तादात के बराबर सवाब मिलेगा। इस रात बेरी के 7 पत्ते पानी में उबालकर उस पानी से नहाए तो इंशाल्लाह साल भर तक जादू टोने के असर से महफूज़ रहेगा।

इस रात तीन काम करने चाहिए,
1.कब्रस्तान जाकर मुर्दों के लिए इस वाले सवाल और दुआए मगफिरत की जाए।
 2.यह रात नफिल नमाज पढ़ने तिलावत करने और दुरूद व दुआ पढ़ने के साथ अपने गुनाहों से तौबा करने में बितायी जाए ताकि अल्लाह की रेहमत हमारे गुनाहों पर पर्दा डालकर हमें दोज़ख की आग से बरी होने का हकदार बना दे।
 3.रात इबादत में गुजारने के बाद दिन में रोजा रखा जाए यह सुन्नत है।

इसके अलावा इसाले सवाब के लिए कुछ मीठी चीजें बनवाना फातिहा लगवाना खाना खिलाना व तोहफे पेश करने में कोई हर्ज नहीं लेकिन इसे पटाखों का त्यौहार समझना नादानी है जो सरासर नाजायज़ और हराम है। इस रात में अल्लाह पाक बनी कलब की बकरियों के बाल की तादात के बराबर गुनाहगारों को जहन्नम से आज़ाद फरमा देता है। लेकिन काफिर, दुश्मनी रखने वाले, रिश्ता तोड़ने वाले, मां बाप की नाफरमानी करने वाले और शराब पीने वालों पर रहम नहीं फरमाता। ऐसे लोगों की बख्शीश नहीं होती।

इस रात का फैज़ हासिल करने के लिए चाहिए कि अपने गुनाहों से सच्ची तौबा करें, अगर मां-बाप नाराज़ है तो उन्हें खुश किया जाए क्योंकि जब तक वह राज़ी नहीं होंगे तब तक अल्लाह राज़ी नहीं होगा। किसी दिनी भाई से मनमुटाव हो गया हो या सलाम कलाम बंद हो तो मेल मिलाप करके गलतफहमी दूर करके इसका बहाल किया जाए फिर अपने रब से रहम व करम और मगफिरत की भीख मांगी जाये इस यकीन के साथ की अल्लाह पाक हमें भी इसके फैज़ से मालामाल फरमाएगा।

इस रात में इबादत करने का सवाब दूसरी रातो के मुकाबले ज्यादा मिलता है। एक हदीस में है जो आदमी इस रात 100 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े अल्लाह उसके पास 100 फरिश्ते भेजेगा उनमें से 30 फरिश्ते उसे जन्नत की बशारत सुनाएंगे। 30 फरिश्ते उसे दोज़ख के अज़ाब से महफूज रहने की खुशखबरी देंगे और 30 फ़रिश्ते उसे दुनियावी बलाओं और मुसीबतों से बचाएंगे और 10 फ़रिश्ते शैतान के वसवसे और धोखे से बचाएंगे। इस रात मुस्तफा जाने रेहमत सल्ललाहो अलैहि वस्सलम की उम्मत पर अल्लाह की खास रहमतें नाज़िल होती है।

यह रात तौबा इस्तिगफार की रात है इसलिए हमें चाहिए कि हम इसकी कद्र करें इसकी अहमियत समझे और अपने गुनाहों से माफी मांगे,तौबा करे और  तौबा पर कायम रहने की नियत भी रखें।

ज़कात क्या हैं ? (What is Zakat)

ज़कात क्या हैं ? (What is Zakat)

कुरान मजीद में अल्लाह पाक ने 82 जगहों पर अपने बन्दों को ज़कात अदा करने की ताकीद फ़रमाई हैं। इतनी सख्त ताकीदो के बावजूद जो मुसलमान अपने माल की सालाना ज़कात अदा नहीं करते गोया वह 82 बार अपने रब की नाफरमानी करते हैं। शायद लोग यह सोच कर इतनी बड़ी नादानी करते हैं कि ज़कात देने से माल कम हो जाएगा यह उनकी बड़ी नादानी व भूल है ऐसा सोचना भी गुनाह है।

जकात अदा करने का मतलब यह है कि आप अपने माल का 40 वां हिस्सा आखिरत के लिए मनी ऑर्डर कर रहे हैं, जो आपके लिए आखिरत के बैंक में जमा हो रहा है। इस तरह अपने माल का फायदा आखिरत में आप ही उठाएंगे और दुनिया में यह फायदा हो रहा है कि जकात अदा करने की बरकत से आपका माल पाक हो रहा है उसमें बरकत हो रही है माल में इज़ाफ़ा हो रहा हैं।

ज़कात की बदौलत कौम के गरीबों, जरूरतमंदों की जरूरतें पूरी होती है। इस तरह ज़कात अदा करने की बरकत से आपको इंसानी हमदर्दी का भी सवाब मिल रहा है। जो लोग अपनी हलाल कमाई की ज़कात अदा करते रहते हैं उन्हें इसकी बरकत से चाहे जितनी दौलत मिल जाए वह घमंड नहीं करते, तकब्बुर नहीं करते, अकड़ते नहीं बल्कि अपने रब की इस अता पर उसका शुक्र अदा करते हैं, क्योंकि अल्लाह पाक ने यही तालीम दी है कि अगर तुम मेरा शुक्र अदा करते रहोगे तो मैं तुम्हें खूब अदा अता करूंगा।

अल्लाह पाक ने कुरान मजीद में ज़कात लेने वालों के बारे में बताया है कि 7 तरह के लोग ज़कात लेने के हकदार है और इन्हीं लोगों को देने से ज़कात अदा होगी, इसलिए ज़रूरी है कि यह रकम हक़दारो को ही दी जाए यह भी याद रखना चाहिए कि ज़कात अपने दीनी भाई बहनों की इमदाद का एक फंड है दूसरों को देने से यह हक अदा नहीं होगा।

ज़कात लेने के हकदार

फकीर- जिस के पास ज़रूरत से काम माल हो।
मिस्कीन- ऐसा गरीब इंसान जिस के पास कुछ न हो।
आमिल- ज़कात वसूल करने के लिए इस्लामी हाकिम की तरफ से मुक़र्रर किया गया खादिम भी ज़कात दिए जाने और लेने का हकदार हैं। 
गुलाम- जो किसी की गुलामी में फंसा हुआ हो लेकिन आजकल गुलाम और गुलामी का चलन ख़त्म हो चूका हैं।
कर्जदार- जो क़र्ज़ के बोझ से फंसा हुआ हो
फ़ी सबिलिल्लाहः- अल्लाह के रास्ते में जिहाद करने वाले ज़कात लेने के हक़दार हैं।
मुसाफिर- सफर के दौरान कोई मुसाफिर मुसीबत में आ जाये और ज़रूरतमंद हो जाये भले ही वह मालदार हो लेकिन सफर में किसी मज़बूरी से परेशान हाल हो तो उसे ज़कात देना जायज़ हैं।

ऊपर लिखे जरूरतमंदों में से आप जिसे भी ज़कात देंगे ज़कात अदा हो जाएगी, लेकिन ज़कात अदा करते वक्त सबसे पहले अपने खानदान वालो, फिर रिश्तेदारों को देखना जरूरी है। अगर घर खानदान और रिश्तेदारों में कोई जरूरतमंद है तो सबसे पहले इनकी मदद करना अफजल है।
साल पूरा हो तो अच्छी तरह अपनी मलियत का हिसाब लगाएं फिर उसका चालीसवां हिस्सा 2.5 प्रतिशत निकाल कर अलग रख दे और उसे ज़रूरतमंदो में तक्सीम कर दें।

इस्लाम में मुसलमानों की माली हालत बेहतर बनाने व मदद करने के लिए अल्लाह पाक ने ज़कात अदा फ़रमाई हैं, अगर आदमी इस हकीकत पर गौर करें और इमानदारी से हर साल हक़दारो को उनका हक  पहुंचाया करें तो चंद सालों में एक बड़ी तब्दीली नज़र आने लगेगी। लेकिन अफसोस आजकल लोग इसकी अहमियत नहीं समझते हैं, ज्यादातर लोग ज़कात नहीं देते और जो देते हैं तो इस बात का ख्याल नहीं रखते कि हम जिसको ज़कात दे रहे हैं वह ज़कात लेने का हकदार हैं भी या नहीं। इसी लापरवाही की वजह से ज़कात की रकम उल्टे सीधे हाथों में पहुंच जाती है, और रमज़ान के मुबारक महीने में ना जाने कितने उल्टे सीधे लोग फर्जी रसीद लेकर छोटे बड़े शहरों में घूम घूम कर एक बड़ी रकम जमा कर लेते हैं। अल्लाह खैर फरमाए !

यही वजह है कि आज हमारी तालिमी इदारों का हाल भी दिन-ब-दिन खराब होता जा रहा हैं।
अल्लाह हमें नेक तौफीक दे आमीन । 

अल्लाह तआला के 99 नाम (99 Names of Allah)

अल्लाह तआला के 99 नाम (99 Names of Allah)

हिंदी में अल्लाह तआला के 99 नाम और उनका मतलब, पढ़े और शेयर किए बिना मत छोड़ना

01- अल्लाह (सबसे बड़ा नाम)
02- अर रहमान (बहुत रहम वाला)
03- अर रहीम (बहुत बड़ा मेहरबान)
04- अल मलिक (हक़ीक़ी बादशाह )
05- अल कुद्दूस (बहुत ज़्यादा पाक)
06- अस सलाम (सलामती वाला)
07- अल मुअमिन (अमन देने वाला)
08- अल मुहैमिन (निगहबान)
09- अल अज़ीज़ (इज़्ज़त के काबिल)
10- अल जब्बार (ज़बरदस्त)
11- अल मुतकब्बिर (बड़ाई वाला)
12- अल ख़ालिक़ (पैदा करने वाला)
13- अल बारी (सूरत बनाने वाला)
14- अल मुसव्विर (सूरत देने वाला)
15- अल गफ़्फ़ार (बड़ा बख़्शने वाला)
16- अल कह्हार (क़हर करने वाला)
17- अल वह्हाब (बहुत ज़्यादा देने वाला)
18- अर रज़्ज़ाक (रोज़ी देने वाला)
19- अल फत्ताह (खोलने वाला)
20- अल अलीम (जानने वाला)
21- अल काबिज़ (कब्ज़ा करने वाला)
22- अल बासित (फ़र्राखी देने वाला)
23- अल ख़ाफ़िज़ (गिराने वाला)
24- अर राफ़िअ (उठाने वाला)
25- अल मुइज़ (इज़्ज़त देने वाला)
26- अल मुज़िल (ज़लील करने वाला)
27- अस समीअ (सुनने वाला)
28- अल बसीर (देखने वाला)
29- अल हकम (फ़ैसला देने वाला)
30- अल अद्ल (इंसाफ करने वाला)
31- अल लतीफ़ (नरमी करने वाला)
32- अल ख़बीर (ख़बर रखने वाला)
33- अल हलीम (बुर्दबार)
34- अल अज़ीम (बहुत बड़ा)
35- अल ग़फ़ूर (बार बार बख़्शने वाला)
36- अश शकूर (बहुत अज्र देने वाला)
37- अल अली (बहुत बुलन्द)
38- अल कबीर (बहुत बड़ा)
39- अल हफ़ीज़ (संभालने वाला)
40- अल मुकीत (रोज़ी देने वाला)
41- अल हसीब (हिसाब लेने वाला)
42- अल जलील (बुज़ुर्गी वाला)
43- अल करीम (बड़ा सख़ी)
44- अर रक़ीब (निगहबान)
45- अल मुजीब (दुआ कुबूल करने वाला)
46- अल वासिअ (कुशादगी वाला)
47- अल हक़ीम (हिकमत वाला)
48- अल वदूद (भलाई चाहने वाला)
49- अल मजीद (बड़ी शान वाला)
50- अल बाइस (उठाने वाला)
51- अश शहीद (गवाह)
52- अल हक़ (सच्चा और साबित)
53- अल वकील (कारसाज़)
54- अल क़वी (ताक़तवर)
55- अल मतीन (ज़बरदस्त क़ुव्वत वाला)
56- अल वली (मददग़ार)
57- अल हमीद (तारीफ़ किया गया)
58- अल मुह्सी (गिनती करने वाला)
59- अल मुब्दी (पहले पहल पैदा करने वाला)
60- अल मुईद (दोबारा पैदा करने वाला)
61- अल मुहयी (ज़िन्दा करने वाला)
62- अल मुमीत (मारने वाला)
63- अल हैय् (हमेशा ज़िन्दा रहने वाला)
64- अल कय्यूम (दुनिया क़ायम रखने वाला)
65- अल वाजिद (हर चीज़ को पालने वाला)
66- अल माजिद (बड़ी इज़्ज़त वाला)
67- अल वाहिद (अकेला)
68- अल अहद (एक)
69- अस समद (जो किसी का मोहताज न हो)
70- अल क़ादिर (क़ुदरत रखने वाला)
71- अल मुक़्तदिर (पूरी क़ुदरत रखने वाला)
72- अल मुक़द्दिम (आगे करने वाला)
73- अल मुअख्खिर (पीछे करने वाला)
74- अल अव्वल (सबसे पहले)
75- अल आख़िर (सब के बाद)
76- अज़्ज़ाहिर (सब पर ज़ाहिर)
77- अल बातिन (सबसे पोशीदा)
78- अल वाली (हक़ीक़ी मालिक)
79- अल मुतआली (बहुत ही बुलन्द)
80- अल बर्र (तमाम नेकी के जरिया)
81- अत तव्वाब (तौबा क़ुबूल करने वाला)
82- अल मुन्तकिम (इन्तिक़ाम लेने वाला)
83- अल अफूव (दरगुज़र करने वाला)
84- अर रऊफ (शफ़क़त करने वाला)
85- मालिकुल मुल्क (बादशाहत का मालिक)
86- जुल जलालि वल इकराम (इज़्ज़त और बुलंदी अता करने वाला)
87- अल मुक़सित (इंसाफ़ करने वाला)
88- अल जामिअ (जमा करने वाला)
89- अल ग़नी (किफ़ायत करने वाला)
90- अल मुग़नी (बेपरवाह करने वाला)
91- अल मानिअ (रोकने वाला)
92- अज़ ज़ार (नुकसान पहुँचाने वाला)
93- अन नाफ़िअ (नफ़ा पहुँचाने वाला)
94- अन नूर (मुनव्वर करने वाला)
95- अल हादी (रास्ता दिखाने वाला)
96- अल बदीअ (बेमिसाल पैदा करने वाला)
97- अल बाक़ी (बाक़ी रहने वाला)
98- अल वारिस (हक़ीक़ी वारिस)
99- अर रशीद (सीधी राह दिखाने वाला)

दुरूद शरीफ की फ़ज़ीलत (Superiority of Darood Sharif)

दुरूद शरीफ की फ़ज़ीलत (Superiority of Darood Sharif)

दुरुद शरीफ पढ़ने के बेशुमार फायदे हैं। दुरुद शरीफ हर मुसीबत, हर बीमारी का इलाज हैं, इसको पढ़ने से आप कामयाबी की बुलंदी हासिल कर सकते हो, दुरुद शरीफ पढ़ने से इंसान के गुनाह बख़्श दिए जाते हैं। दुरुद पढ़ने से दिल ज़िंदा हो जाता हैं। आज हम कुछ दुरुद शरीफ की फ़ज़ीलत और फायदे के बारे में बात करेंगे। जिस पर अमल करके आप कई सारे फायदे हासिल कर सकते हो।

अल्लाहु रब्बू मुहम्मदिन सल्ला अलैहि वसल्ल्मा नहनु इबादु मुहम्मदिन सल्ला अलैहि वसल्ल्मा
यह दुरुद शरीफ काम से काम 100 मर्तबा पढ़ने से दीन व दुनिया के हर काम में कामयाबी आप के कदम चूमेगी नाकामी जैसे हालात दूर हो जायेंगे।

सल्लल्लाहु अलन्नबिय्यिल उम्मिययी व आलिहि सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सालतव व सलामन अलैका या रसूल्लाहि
यह दुरुद शरीफ हर जुमा की नमाज़ के बाद मदीना मुनव्वरा की जानिब मुँह करके 100 मर्तबा पढ़ने से बेशुमार फ़ज़ाइल व बरकात हासिल होते हैं।

अल्लाहुम्मा सल्लि अला सय्यदीना व मौलाना मुहम्मदीव व अला आलिही व सल्लिम
जो शख्स यह दुरुद शरीफ पढ़े अगर खड़ा था तो बैठने से पहले और बैठा था तो खड़े होने से पहले उस के गुनाह माफ़ कर दिए जायेंगे।

अल्लाहुम्मा सल्लि अला सय्यदीना व मौलाना मुहम्मदीव व अला आलि सय्यदीना व मौलाना मुहम्मदिन कमा तुहिब्बु व तर्दा लहू
जो शख्स एक मर्तबा यह दुरुद शरीफ पढता हैं तो सत्तर फ़रिश्ते एक हज़ार दिन तक उसके नाम-ऐ-आमाल में नेकियां लिखते हैं।

अल्लाहुम्मा सल्लि अला सय्यदीना मुहम्मदीव व अला आलिही बि-कदरी हुसनिहि व जमालिहि
जो शख्स किसी मुसीबत या परेशानी में हो तो इस दुरुद शरीफ को एक हज़ार मर्तबा मुहब्बत व शोक से पढ़े अल्लाह तआला उसकी मुसीबत टाल देगा और उसको अपनी मुराद में कामयाब कर देगा।

अल्लाहुम्मा सल्लि अला मुहम्मदीव व आलिहि व असहाबिहि बि-अदा-दी-मा-फी जमीइल क़ुरआनी हरफन हरफव्वा बि-अदा-दि कुल्लि हरफिन अलफ़न अलफ़न
तीन मर्तबा सुबह शाम यह दुरुद शरीफ पढ़ने से ज़बरदस्त दीनी व दुनियावी कामयाबी मिलती हैं।

अल्लाहुम्मा सल्लि व सल्लिम अलन नबीय्यत ताहिरि
यह दुरुद शरीफ एक ही साँस में 11 मर्तबा पढ़ने से मुँह में पैदा होने वाली बदबू दूर हो जाती हैं।

सल्लल्लाहु अलैका या मुहम्मदु नूरम-मिन नुरिल्लाहे
कोई रंज व गम या मुसीबत आ जाये तो दिल से यह दुरुद पाक को पढ़ने से हर किस्म की मुसीबते, तकलीफे और गम ख़त्म हो जाते हैं।

अशुरा (मुहर्रम) की गलत रस्में (Incorrect rituals of Ashura (Muharram)

अशुरा (मुहर्रम) की गलत रस्में (Incorrect rituals of Asura (Muharram)

मोहर्रम के मौके पर बहुत सारी गलत रस्मो या कामो को किया जाता हैं इन रस्मो का इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं है, लेकिन मुसलमान आज उन्हें अपना ईमान समझने लगे हैं उनका यह मानना हैं की आशूरा के दिन यही चीज़े की जानी चाहिए यह बहुत बड़ी गुमराही है हजारों रुपए का रोज़ा बनाकर पानी में ठंडा कर देना,मिट्टी में दफन कर देना या जंगल में फेंक देना कौन सी अकलमंदी या इस्लामी शान हैI इसी तरह से तो कौम का बहुत बड़ा सरमाया (संपत्ति) बर्बाद हो जाता है जो कि हराम है

इसके अलावा ढोल ताशे बजाना,मातम करते हुए गली गली फिरना,हाथो और सीने को जंजीरों,औज़ारो से जख्मी करना, ताजिये के नीचे अपने बच्चे को लेटाना, ताजिए को सजदा करना उसके नीचे की धूल अपने चेहरे पर मलना, बच्चों को मोहर्रम का फकीर बनाना, मोहर्रम की फातिहा के लिए भीख मंगवाना,तैयार होकर नए कपड़े पहनकर सज धज कर सीना खोले हुए गली-गली घूमना,ताजिया का जुलूस देखने के लिए औरतों,लड़कियों का बेपर्दा होकर सज-धज कर बाज़ार में घूमना,ताजियों को इमाम हुसैन का रोज़ा मानना उसे झुक झुक कर सलाम करना,ताजिये को हज़रत इमाम हुसैन का रोज़ा समझकर फातेहा लगाना,फूल माला चढ़ाना इसके अलावा और दूसरी गैर इस्लामी रस्मे हमारे लिए जायज़ नहीं

हर मुसलमान को इन हरकतों से बचना चाहिए यह सब काम करना गुनाहे कबीरा हैं। लेकिन नहीं यह तो सालों से चला आ रहा हैं इसे करना तो वह अपना फ़र्ज़ मानते हैं इन सब कामो को करने की बजाये हमें उस दिन नमाज़,रोज़ा और क़ुरान की तिलवात करनी चाहिए भूखे प्यासे लोगो के लिए खाने पीने का इंतेज़ाम करना चाहिए 

ताजियादारी या मोहर्रम की रस्में हिंदुस्तानी मुसलमानों का एक त्यौहार सा बन गया है इनका इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं है हमें त्यौहार मनाना, खुशी मनाना जायज़ है लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि हमारी इस हरकत या अमल से इस्लामी अक़ीदे को नुकसान तो नहीं पहुंच रहा है 

अल्लाह हमें हज़रत इमाम हुसैन की शहादत के असली पैगाम पर अमल करने की तौफीक अता फरमाए आमीन  

मुहर्रम की अहमियत (Importance of Muharram)

मुहर्रम की अहमियत (Importance of Muharram)

रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, जिसने मोहर्रम में किसी एक दिन भी रोज़ा रखा तो उसे एक रोजे के बदले 30 रोज़ो का सवाब दिया जाएगा  जिसने आशूरा (मोहर्रम) की दसवीं तारीख को रोज़ा रखा उसे 10000 फ़रिश्तो, 10000 शहीदों और 10000 हज उमरा करने वालों का सवाब दिया जाएगा  जिसने अशुरा को किसी यतीम के सर पर हाथ फेरा तो अल्लाह यतीम के सर के हर बाल के बदले जन्नत में उसका दर्जा बुलंद फरमाएंगा  जिसने आशूरा के दिन किसी मोमिन को रोज़ा खुलवाया गोया उसने अपनी तरफ से सारी उम्मते मोहम्मदी को रोज़ा खुलवाया

जिसने आशूरा का रोज़ा रखा है उसके लिए 60 साल की इबादत का सवाब अल्लाह तआला लिख देता है  सातों आसमानों के फ़रिश्तो का सवाब लिख देता हैI  हज़रत उमर फारुक ए आजम ने रसूले अकरम से अर्ज़ किया या रसूललल्लाह आशूरा का रोज़ा देकर खुदा ने हमारी बड़ी इज्जत बढ़ा दी हैं  सरकार ने फरमाया बेशक क्योंकि इसी दिन अल्लाह ने अर्श, कुर्सी  सितारों,पहाड़ों,जिब्राइल और दुसरो को भी पैदा फरमाया   
हज़रत इब्राहिम को आशूरा के दिन ही नमरूद की आग से निजात बक्शी 
फ़िरऔन आशूरा को ही नील नदी में डुबाया गया 
हज़रत इदरीस को इस दिन आसमान पर उठाया 
हज़रत ईसा अलेहिस्सलाम की पैदाइश आशूरा के ही दिन हुई हज़रत आदम की तौबा इसी दिन कबूल की  
हज़रत सुलेमान को बादशाहत आशूरा के दिन ही बख्शी गई और कयामत भी आशूरा के दिन आएगी 
आसमान से सबसे पहली बारिश आशूरा के दिन ही हुई 

आशूरा के दिन ग़ुस्ल करने वाला खतरनाक बीमारियों से महफूज रहेगा इस दिन जो आदमी आंखों में पत्थर का सुरमा लगाएगा साल भर तक उसकी आंखें (एक तरह की बीमारी) नहीं आएगी I जिसने आशूरा के दिन चार रकात नमाज इस तरह पढ़ी कि हर रकात में एक बार अल्हम्दो और 50 बार कुलहुवल्लाह पढ़ी, अल्लाह तआला उसके 50 साल के अगले पिछले गुनाह माफ फरमा देगा  उसके लिए नूर के हजारों महल तैयार कराएगा, नमाज के बाद 70 बार दुरूद शरीफ भी पढ़ना चाहिए

आशूरा के दिन अपने घर वालों को अच्छे से अच्छा खाना खिलाओ जो ऐसा करेगा खुदा उसकी रोज़ी में साल भर तक खूब बरकत अता फरमाएगा  आशूरा का रोजा रखने वालों को मौत के वक्त कोई परेशानी नहीं होगी  बनी इसराइल पर साल में यही आशूरा का रोजा फ़र्ज़ था  पैग़ंबरे इस्लाम भी आशूरा के दिन रोज़ा रखते थे जब आप मदीना तशरीफ़ लाये तो यहूदियों को भी यह रोज़ा रखते देखा जब रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ हुए तो कुछ लोगों ने रोज़ा रखा कुछ ने छोड़ दिया I आपने यहुदीओ से पूछा आशूरा का रोज़ा क्यों रखते हो? जवाब दिया कि इस तारीख को अल्लाह ने फ़िरऔन को दरिया में गर्क करके हमारे नबी हज़रत मूसा को निजात बख्शा यह सुनकर आपने फरमाया हमारा ताल्लुक हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से तुमसे ज़्यादा है यह कह कर आप ने मुसलमानों को दो दिन (9-10 मोहर्रम) को रोज़ा रखने का हुक्म दिया 

आशूरा की फजीलत यह है कि इसी दिन हजरत इमाम हुसैन कर्बला में शहीद किए गए थे   
आज हिंदुस्तान में आशूरा इसी नाम और याद से जाना जाता है कि इसी दिन रसूले अकरम के भूखे प्यासे नवासे और उनके खानदान वाले कर्बला में शहीद किए गए थे I उनकी शहादत की याद में आशूरा मनाया जाता हैं 

आशूरा के दिन कुछ चीजें मुस्तहब है, 
रोजा रखना 
सदक़ा करना 
नफ़्ल नमाज़ पढ़ना
1000 बार कुलहु वल्लाह शरीफ पढ़ना 
आलिमो की ज़ियारत करना 
यतीम के सर पर हाथ फेरना
घर वालों को खूब अच्छा खिलाना पिलाना
भूके प्यासे लोगो के लिए खाना पानी का इंतेज़ाम करना

अल्लाह हमें इन सब बातों पर अमल करने की तौफीक अत फरमाए आमीन   

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