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इस्लाम में बहन बेटी की हदीस (Behen Beti Ki Hadees in Islam)

इस्लाम में बहन बेटी की हदीस (Behen Beti Ki Hadees in Islam)

बेटियां हमारे लिए अल्लाह की नेअमत व रहमत हैं। लेकिन अफ़सोस आज दुनिया ने अपने गलत ख़यालो और रस्मो की वजह से उन्हें अपने लिए मुसीबत समझ लिया हैं। इस्लाम ही दुनिया का वाजिब मज़हब हैं। जिसने माँ बहनो और बेटियों की इज़्ज़त अफ़ज़ाई की और उनकी परवरिश तालीम व तर्बियत और खिदमत पर दुनियां व आख़िरत की बशारते सुनाई। लेकिन आज की नयी पीढ़ी में आज उन्हे पैदा होने से पहले ही मारकर उन्हें जीने के हक़ से महरूम किया जा रहा हैं। जिस की खबरे हम आये दिन सुनते रहते हैं। आइये इस माहौल में हम पैगंबरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के पैग़ामे रहमत सुने और अपनी इस्लाह की कोशिश करे।

हज़रत बीबी आईशा रदियल्लाहो अन्हो का बयान हैं एक दिन एक औरत अपनी दो बच्चियों को लेकर मेरे पास आयी। मैंने उसे तीन खजूरे दी उसने एक एक खजूर अपनी बच्चियों को दे दी और शायद एक अपने पास रख ली। दोनों बच्चियों वह खजूरे खा ली तो उस औरत ने अपनी खजूर दोनों बच्चियों को दे दी। उनकी यह बात जब मैंने प्यारे रसूल को बताई तो आपने फ़रमाया, अल्लाह ने उन दोनों बच्चियों की वजह से उस औरत पर जन्नत वाजिब आकर दी या उसे जहन्नम  से आज़ाद कर दिया।

देखा आपने बेटी की मोहब्बत की बदौलत माँ जन्नती बन गयी। इस्लाम ने किस कद्र बच्चियों और औरतो का मर्तबा बढ़ाया। अल्लाह के प्यारे रसूल ने फ़रमाया जिसके दो बेटियां हो। जब तक उसके पास रहे वह उनके साथ अच्छा बर्ताव करे, उनकी अच्छी तालीम व तर्बियत करे उनका अच्छी जगह निकाह कराये। तो वह बच्चियां उसे जन्नत में ले जाएगी। तिर्मिज़ी शरीफ की हदीस हैं अल्लाह के प्यारे रसूल ने फ़रमाया, जिसके दो बच्चियां या बहने हो जब तक वह उसके पास रहे वह उनकी अच्छी तरह परवरिश करे तो ऐसा आदमी जन्नत में दाखिल होगा।

एक और हदीस में अल्लाह के प्यारे रसूल ने फ़रमाया, जिसने अपनी तीन बेटियों की परवरिश अच्छी तरह की, वह जन्नत में मेरे इतने करीब रहेगा जैसे हाथ की यह दोनों अंगुलियां। ऐसे आदमी को दिन में रोज़ा रखने वाले और रात में नमाज़े पढ़ने वाले मुजाहिद जैसा सवाब मिलेगा।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रदियल्लाहो अन्हो का बयान हैं। अल्लाह के प्यारे रसूल को मैंने यह फरमाते हुए सुना की जिसके एक बच्ची हो वह उसे ज़िंदा दफन न करे बल्कि उसकी अच्छी परवरिश करे। उसे बेटो से कम न समझे। अल्लाह पाक ऐसे बाप को जन्नत में दाखिल फरमाएगा।

आइये एक हदीस और पढ़ते चले। हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहो अन्हो का बयान हैं, हमारे आका ने फ़रमाया जिसके तीन बच्चियां हो और गरीब होने की वजह से उनकी तर्बियत व परवरिश में उसे परेशानियां उठानी पड़े और यह उन सारी तकलीफो को बर्दाश्त करते हुए सब्र से काम ले। अल्लाह पाक बच्चियों के साथ प्यार भरा बर्ताव करने की वजह से उसे जन्नत में दाखिल फरमा देगा।

आज दुनिया जिसे अपने लिए बोझ समझ रही हैं जिसे पैदा होने से पहले ही मार दिया जाता हैं। जिसे बेटो से कम समझा जा रहा हैं। जिसे उसके हक़ से महरूम किया जा रहा हैं। उसी बहन बेटी की तालीम व तर्बियत और परवरिश करने वालो को जन्नत की बशारत सुनाई जा रही हैं। ऐसा हुक्म व ताकीद दुनिया के किसी और मज़हब ने नहीं दी हैं। और खुद पैगंबरे इस्लाम ने अपनी बेटियों से बेमिसाल प्यार फरमा कर दुनियां वालो को बेटियों से प्यार करने की तालीम दी हैं।
खुदा के लिए बहन बेटियों को बोझ न समझे बल्कि उन्हें अपने लिए अल्लाह की रहमत माने।

सच्चा दोस्त कौन हैं? (Who is True Friend)

सच्चा दोस्त कौन हैं? (Who is True Friend)

दोस्ती एक बहुत बड़ी निस्बत (रिश्ता) हैं। दोस्ती निभाने के लिए बहुत बड़ी क़ुरबानी भी देनी पड़ती हैं। लेकिन आज दोस्ती का मतलब बिलकुल बदल गया हैं। लोग अपनी ज़रूरत और काम के हिसाब से दोस्ती करते हैं, और मतलब निकल जाने के बाद अलग और दूर हो जाते हैं।

बुज़ुर्गो ने फ़रमाया, ऐसे आदमी से दोस्ती मत करो जो तुम्हारी कमज़ोरियाँ ऐब न बताये और तुम्हारी कमज़ोरियों को तुम्हारी खूबियां बताये। बल्कि दोस्त ऐसे बनाओ जो तुम्हे तुम्हारी कमज़ोरियों से ख़बरदार करता रहे ताकि तुम सुधर जाओ और गुनाहो से बच सको। लेकिन आज हाल यह हैं की अगर कोई इंसान उसके दोस्त की गलती या उसके अंदर की कोई बुराई बताये तो पल में लोग उससे मुँह मोड़ लिया करते हैं। और उसे अपना दुश्मन समझने लगते हैं। यही बात इंसान के ईमान को कमज़ोर करने लगती हैं। अगर आपमें कोई बुरी आदत हैं और आपका दोस्त आपको उससे बचाना चाहता हैं तो वह आपके भले के लिए बोल रहा हैं, न की आपको तकलीफ पहुंचा रहा हैं।

आजकल देखा जाता हैं, की अगर कोई इंसान कोई अच्छा बिज़नेस या नौकरी में लग जाता हैं तो उसके दोस्त उससे जलन रखना शुरू कर देते हैं। अगर वो कामयाब हो जाये तो जलते हैं और नाकामयाब हो जाये तो उस पर हँसते हैं। दूसरा अगर कोई शख्स उसके दोस्त से मदद चाहता हैं या उसकी राय चाहता हैं, किसी अच्छी नौकरी के लिए और उसका दोस्त उसके लिए अच्छी नौकरी होते हुए भी कोई बहाना कर रहा हैं या कहे वह उसकी कामयाबी को देखना नहीं चाहता। ऐसा शख्स भी कभी दोस्त नहीं हो सकता। ऐसे लोगो से हमेशा दूर रहे।

लड़कियों में भी यही देखा जाता हैं अगर किसी लड़की की शादी अच्छे घर में हो जाये या उसे अच्छा शोहर मिल जाये तो उसकी सहेलियां उससे दिल ही दिल में नफरत करना शुरू कर देती हैं, की इसको इतना सब कैसे मिल गया। बहुत से दोस्त एक दूसरे के चेहरे और उनके रहन सहन का मज़ाक बनाते हैं। वो ये सोचते हैं की हम इनसे काफी बेहतर हैं। लोग हमें ही देखेंगे। एक तरह से वो आपकी दोस्ती का मज़ाक बना रहे हैं। असल में एक सच्चा दोस्त वह हैं जो अपनी अच्छाई को छुपाकर अपने दोस्त को हमेशा आगे रखें और उसके साथ कदम कदम पर चले। मुश्किल वक़्त में उसका साथ दे।

आजकल किसी का मुश्किल वक़्त आते ही कुछ लोग अपने दोस्तों से छुपते छुपाते नज़र आते हैं। अगर उन्हें याद करो तो बहाना बनाते हैं की फलां मेरे ये काम हैं वो काम हैं। अगर कोई शख्स 50 लोगो से आपके लिए लड़ जाये समझो उसके दिल में आपके लिए बहुत इज़्ज़त हैं। लेकिन अफ़सोस ऐसे लोग बहुत कम देखने को मिलते हैं।

बहरहाल अच्छा और सच्चा दोस्त वही हैं जो हर हाल में अपने दोस्त का भला चाहे उसकी कामयाबी को अपनी कामयाबी समझे, उसका नुकसान अपना नुकसान समझे,उसके मुश्किल वक़्त को अपना मुश्किल वक़्त समझे यही आपकी ज़िम्मेदारी हैं और यही इस्लाम कहता हैं। अल्लाह पाक हमे इस्लाम के उसूलो पर चलने की तौफीक अता फरमाए आमीन।

इस्लाम में ग़ीबत क्या हैं? What is Gheebat in Islam

इस्लाम में ग़ीबत क्या हैं? What is Gheebat in Islam

पीठ पीछे किसी की बुराई बयां करने को ग़ीबत कहा जाता हैं। यह गुनाहे कबीरा हैं। क़ुरान शरीफ में ग़ीबत करने वाले को अपने मुर्दा भाई का गोश्त खाने वाला जैसा कहा गया हैं। यह बीमारी इतनी आम हो चुकी हैं की लोग इस से बिलकुल नहीं डरते न इसके अंजाम की परवाह करते हैं। ग़ीबत की नसुहात से ईमान की हरारत खत्म हो जाती हैं। मरते वक़्त ईमान खतरे में रहता हैं। ग़ीबत करने वाले की दुआ कबूल नहीं होती। ग़ीबत से नमाज़ और दूसरी इबादतों का नूर खत्म हो जाता हैं। ग़ीबत करना तो ज़िना से भी बदतर गुनाह हैं। गीबत करने वाले को जहन्नम में मुर्दार खाना पड़ेगा।

ग़ीबत के बारे में एक दिन अल्लाह के रसूल ने सहाबा से पूछा क्या तुम जानते हो की ग़ीबत क्या हैं? सहाबा ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह आप ही बेहतर जानते हो। आपने फ़रमाया तुम अपने भाई के बारे में ऐसी बात करो जो उसे पसंद न हो। सहाबा ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह अगर वह बात उसके अंदर हो तो? आपने फ़रमाया इसको ही तो ग़ीबत कहते हैं। अगर वह बुराई उसके अंदर न हो तो उसे इलज़ाम कहा जायेगा।

बहरहाल ग़ीबत बहुत सारी तबहियो की जड़ हैं। इसकी वजह से आज हमारे घर लड़ाई झगड़ो का अखाडा बन गए हैं। आजकल देखा जाता हैं लोगो एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए पीठ पीछे उस शख्स की बुराई करते हैं। हमारे घरो में ही देख लो कोई अपने भाई की बुराई करता हैं तो कोई भाभी की कोई उनके बच्चो की बुराई करता हैं। तो कोई उनके अच्छे रहन सहन की कोई अगर ईमानदारी से ज़्यादा पैसा कमा रहा है तो लोग कहते हैं ये तो हराम का खाता हैं। हर कोई एक दूसरे की बुराई करने में लगा हैं। चाहे वो काम धंधा के मामले में हो या अच्छी नौकरी के मामले में लोग इन हरकतों से बाज़ नहीं आते,क्यूंकि उन्हें अल्लाह का खौफ ही नहीं हैं।

जो लोग ऐसा कर रहे हैं वो मौत के वक़्त बहुत घबराएंगे। उन्हें मौत इतनी आसानी से नसीब नहीं होगी। इस ग़ीबत की वजह से लोग आपस में लड़ रहे हैं। एक दूसरे को मार रहे हैं फिर लोग कहते हैं खुदा हमारी नहीं सुनता। आप जो भी हरकत दिन भर में करते हैं खुदा के पास उन सब हरकतों का हिसाब रहता हैं। आज लोग दूसरे धर्म के लोगो की बुराई करते हैं फलाना इनका धर्म ऐसा हैं वैसा हैं। अगर आप अपने दीन पर ध्यान देंगे तो इंशाल्लाह पूरी कायनात आपके दीन को अपना लेगी।

खुदा के लिए हमे चाहिए की हम अपनी ज़बान पर काबू रखे लोगो की बुराइयाँ करना बंद करे। इस्लाम के उसूलो पर चले ताकि अल्लाह हमें कब्र व जहन्नम के अज़ाब से बचा ले   आमीन।

शबे क़द्र की दुआ नमाज़ और इबादत (Shab-e-Qadr ki Dua Namaz or Ibadat)

शबे क़द्र की दुआ नमाज़ और इबादत  (Shab-e-Qadr ki Dua Namaz or Ibadat)

पिछली पोस्ट में हमने लैलतुल कद्र या शबे क़द्र के बारे में बताया था। आज हम इस रात की इबादतों के बारे में बात करेंगे। इस रात की खास इबादत क़ुरान की तिलावत और नफ्ली नमाज़े व ज़िक्र हैं। इसलिए कुछ वक़्त तिलावत में बिताये कुछ नफ्ली नमाज़े पढ़े। और कुछ देर इस रात की खास दुआ अल्लाहुम्मा इन्नका अफुउन तुहिब्बुल अफ़्व फअफ़ो अन्नी पढ़े।

शबे क़द्र की नफ़्ल नमाज़े 


4 रकात नमाज़ इस तरह पढ़े की हर रकात में एक बार अल्हम्दो शरीफ एक बार इन्ना अन्ज़लना और 27 बार कुल्हुवल्लाह शरीफ पढ़े। इंशाल्लाह अल्लाह करीम आपको गुनाहो से पाक फरमा देगा।

कम से कम 2 रकात ही खुलूस के साथ इस तरह पढ़े की हर रकात में सूरह फातेहा के बाद 1 बार इन्ना अन्ज़लना और 3 बार कुल्हुवल्लाह शरीफ पढ़े। इंशाल्लाह आपको शबे कद्र की बरकत हासिल होगी।

हज़रत अली शेरे खुदा फरमाते हैं, जो आदमी इस रात 7 बार सूरह अल क़द्र इन्ना अन्ज़लना पढ़ेगा। अल्लाह पाक उसे बलाओं और मुसीबतो से बचाता हैं, और 70 हज़ार फ़रिश्ते उसके लिए जन्नत की दुआ करते हैं।

हज़रत बीबी आइशा फरमाती हैं मैने अर्ज़ किया या रसुल्लाह, शबे क़द्र की रात क्या दुआ माँगे। आपने फ़रमाया अल्लाहुम्मा इन्नका अफुउन तुहिब्बुल अफ़्व फअफ़ो अन्नी

2 रकात नमाज़ इस तरफ पढ़े की हर रकात में सूरह फातेहा के बाद 7 बार कुल्हुवल्लाह शरीफ और सलाम फेरने के बाद 70 बार अस्तग़फिरउल्लाह व अतूबो इलैहि पढ़े। अल्लाह पाक उसे और उसके माँ बाप के गुनाहो को बक्श देगा।

4 रकात नमाज़ इस तरफ पढ़े की हर रकात में सूरह फातेहा के बाद 3 बार इन्ना अन्ज़लना और 7 बार कुल्हुवल्लाह शरीफ पढ़े। इंशाल्लाह मौत के वक़्त की बेचैनी से महफूज़ रहेंगे।

4 रकात नमाज़ इस तरह पढ़े की हर रकात में अल्हम्दो शरीफ के बाद एक बार इन्ना अन्ज़लना और 27 बार कुल्हुवल्लाह शरीफ पढ़े। इस नमाज़ की बरकत से गुनाह माफ़ हो जायेंगे और अल्लाह पाक आपको जन्नत में आला मक़ाम अता फरमाएगा।

4 रकात नमाज़ इस तरह पढ़े की हर रकात में अल्हम्दो शरीफ के बाद 3 बार इन्ना अन्ज़लना और 50 बार कुल्हुवल्लाह शरीफ पढ़े और सलाम फेरने के बाद सजदे में सर रखकर एक बार सुब्हानल्लाहे वल्हम्दुलिल्लाहे व लाइलाहा इल्लल्लाहो वल्लाहो अकबर पढ़े। इंशाल्लाह आपको इस मुबारक रात की बेपनाह नेअमते नसीब होगी। इस रात 2 रकात तयीहतुल वुदु और 2 रकात तहियतुल मस्जिद पढ़ना भी बहुत सवाब रखता हैं।

इस रात अगर वक़्त मिले तो कम से कम एक बार सलातुल तस्बीह ज़रूर पढ़ने की कोशिश करे यह इतनी फ़ज़ीलत वाली नमाज़ हैं। अगर यह नमाज़ ज़िन्दगी में अगर एक बार भी पढ़ ली तो इसकी फ़ज़ीलत से इंशाल्लाह बन्दे के गुनाह माफ़ हो जाते हैं। लिहाज़ा कोशिश करे की यह नमाज़ रोज़ न पढ़ सके तो हफ्ते में एक बार वो भी न हो तो महीने में एक बार तो ज़रूर पढ़े।

सलातुल तस्बीह नमाज़ का तरीका

4 रकात नफ़्ल नमाज़ की नियत करे और नियत करने के बाद 15 बार सुब्हानल्लाहे वल्हम्दुलिल्लाहे व लाइलाहा इल्लल्लाहो वल्लाहो अकबर पढ़े अल्हम्दो और सूरत पढ़ने के बाद रुकू में जाने पहले यही तस्बीह 10 बार पढ़े रुकू में सुब्हान रब्बियल अज़ीम पढ़ लेने के बाद 10 बार रुकू से उठने के बाद सजदे में जाने से पहले 10 बार सजदे में जाने पर सुब्हान रब्बियल आला पढ़ लेने के बाद 10 बार फिर दूसरे सजदे में 10 बार यही तस्बीह पढ़े इस तरह हर रकात में 75 बार यह तस्बीह पढ़ी जाएगी और 4 रकात में 300 बार हो जाएगी।

अल्लाह पाक हम मुसलमानो को इस मुबारक रात की बरकतो से नवाज़े और अपनी इबादत की तौफीक बक्शे आमीन।

लैलतुल क़द्र या शबे क़द्र क्या हैं? What is Lailatul Qadr or Shabe Qadr

लैलतुल क़द्र या शबे क़द्र क्या हैं? What is Lailatul Qadr or Shab-e-qadr

रमज़ान महीने की एक रात को लैलतुल कद्र कहा गया हैं। जो खैर व बरकत के एतबार से हज़ार महीनों से भी अफ़ज़ल रात हैं। उसी लैलतुल कद्र को कहीं कहीं शबे कद्र भी कहा जाता हैं। तो कुछ जगह इसे 27 वी शब भी कहा जाता हैं। हदीस के मुताबिक यह रात रमज़ान की 21, 23, 25, 27, 29 वी रात में से कोई एक रात हैं। कुछ बुज़ुर्गो ने 27 वी रात को ही लैलतुल कद्र माना हैं।

इस रात को लैलतुल कद्र इसलिए फ़रमाया गया हैं क्यूंकि इसी रात साल भर के लिए आर्डर जारी होते हैं। ज़िम्मेदार फ़रिश्ते अपने अपने रजिस्टरों में अगले साल होने वाले सारे काम लिख लेते हैं। और अल्लाह के हुक्म के मुताबिक अपने अपने काम अंजाम देते रहते हैं। इसी रात हज़रत आदम सफ़ीयुल्लाह अलैहिस्सलाम का बदन बनाने का सामान आसमान पर जमा किया जाने लगा। इसी रात हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम आसमान पर उठाये गए और इसी रात बनी इसराइल कौम की तौबा क़बूल हुई।

यह रात इबादत की लिए खास हैं। बुखारी शरीफ की हदीस हैं अल्लाह के रसूल फरमाते हैं जो आदमी ईमान व खुलूस के साथ इस रात जागकर अल्लाह की इबादत करेगा या कहे नमाज़ क़ुरान पढ़ेगा। अल्लाह पाक अपने करम से उसके साल भर के गुनाह माफ़ फ़रमा देगा। इस लिए इस कीमती रात को यूं ही नहीं बिताना चाहिए। इस रात इबादत करने वाले को 83 साल 4 महीने से भी ज़्यादा इबादत करने का सवाब मिलता हैं। अल्लाह के रसूल फरमाते हैं जो आदमी इस रात महरूम रह गया या कहे जो आदमी इस रात इबादत नहीं कर सका गोया वह हर तरह के सवाब से महरूम रह गया।

आजकल देखा जाता हैं की कुछ नौजवान इस रात इबादत करने की बजाय सड़को पर तेज़ रफतार में मोटरबाइक दौड़ाते हुए नज़र आते हैं। आमजन को परेशान करते हैं। मस्जिद में इबादत करने की बजाय बाहर बैठकर सिगरेट बीड़ी फूँकते नज़र आते हैं। कुछ नौजवान आस पास की दरगाह में जाकर बेमतलब वक़्त ज़ाया करते हैं। और सेहरी होने तक ऐसे ही पूरी रात निकल लेते हैं। ऐसे लोग अल्लाह की नज़र में बहुत बड़े गुनहगार कहलायेंगे जो इबादत करने की बजाये इस तरह इस रात को इस तरह बर्बाद कर देते है। अल्लाह ऐसे लोगो को हिदायत दे।

इस लिए रमज़ान के मुबारक महीने और इस महीने की इस मुबारक रात की कद्र कीजिये इस रात ज़्यादा से ज़्यादा इबादत करके अपने गुनाहो से माफ़ी मांगे। इस रात बाज़ारो में आवारा गर्दी करने या घूमने की बजाये नौजवानो को मस्जिद या अपने घरों में इबादत करके अल्लाह से अपने गुनाहो की माफ़ी और आगे की ज़िन्दगी अच्छे से गुज़ारने,बीमारियों,मुहताजी से बचने अमन की ज़िन्दगी गुज़ारने की दुआ मांगनी चाहिए। अल्लाह हम सब को इस रात में इबादत करने की तौफीक अता फरमाए आमीन।

सदक़ा और खैरात क्या हैं? (What is Sadqa and khairat)

सदक़ा और खैरात क्या हैं? (What is Sadqa and khairat)

ज़कात फ़ितरा के अलावा नफ्ली तौर पर इबादत की नियत से अल्लाह की रज़ा के लिए अल्लाह के बन्दों के लिए हम जो कुछ खर्च करते हैं, उसे सदक़ा खैरात कहा जाता हैं। यही नहीं बल्कि इस्लाम में तो तकलीफ पहुँचाने वाली किसी चीज़ को रास्ते से हटा देने को भी सदक़ा कहा जाता है। सदक़ा की तौफीक बन्दों के लिए एक इनाम हैं। क्यूंकि इस की बरकत से अल्लाह पाक हमें बहुत सारी बलाओं से महफूज़ रखता हैं, बचाता हैं, हमारी हिफाज़त फरमाता हैं। यही नहीं बल्कि इससे बन्दे के गुनाह भी माफ़ हो जाया करते हैं। अल्लाह के रसूल पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया सदक़ा इस तरह गुनाहो को बुझा देता हैं जिस तरह पानी आग को बुझा देती हैं।

अल्लाह की दी हुई रोज़ी और दौलत को दुसरो पर खर्च करना कोई मामूली या आसान काम नहीं बल्कि बड़े दिल गुर्दे की बात हैं। आदमी के खुद के इतने काम और ज़िम्मेदारियां हैं की उन्हें पूरा करना आज के इस महंगाई के दौर में कितना बड़ा काम हैं। फिर उसके ऊपर गरीब मजबूरो की और मदद करना ये और बड़ी बात हैं। आदमी अगर हिम्मत करके यह नेक काम कर गुज़रता हैं, और लगातार करते रहता हैं तो उसके बदले अल्लाह पाक उसकी भी सारी ज़रूरते पूरी फरमाता हैं। और अल्लाह पाक उसकी इतनी मदद करता हैं जितनी मदद शायद ही उस शख्स ने कभी सोची होगी और सबसे बड़ी बात तो यह हैं की मौत के वक़्त उसकी रूह बड़ी आसानी से कब्ज़ हो जाती हैं। और मरने के बाद अल्लाह के दरबार में पेशी के मौके पर अल्लाह पाक उससे राज़ी होगा।

हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहो अन्हो का बयान हैं एक गुनहग़ार औरत थी। वह एक कुएं से गुज़रने लगी तो वहां एक कुत्ता बैठा था, जो प्यास के मारे मरने जैसा हो रहा था। औरत को उसकी हालत पर तरस आ गया। वह रुक गई। किसी तरह बड़ी मशक्कत(मेहनत) से उस औरत ने कुँए में से पानी निकाला, और उस कुत्ते की प्यास बुझाई। अल्लाह को उस गुनहग़ार औरत की यह बात इतनी पसंद आयी की इस सदके के बदले अल्लाह पाक ने उसके सारे गुनाहो को माफ़ करके उसे बख्श दिया।

अल्लाह की बनायीं हर मखलूक चाहे इंसान हो या जानवर के काम आना, उनकी ज़रूरते पूरी करना भी एक सदक़ा हैं। इस्लाम में इसे भी इबादत का दर्जा दिया गया हैं। इसीलिए अल्लाह के रसूल ने मुसलमानो को दुखियो के काम आने उनकी मदद करने की ताकीद फ़रमाई हैं। हज़रत अबू सईद खुदरी रदियल्लाहो अन्हो का बयान हैं की अल्लाह के रसूल पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जो आदमी अपने किसी भाई को जिस के बदन पर ज़रूरत के मुताबिक कपड़ा न हो, उसे कपड़ा पहनायेगा या देगा। अल्लाह पाक उसे जन्नत का हर जोड़ा पहनायेगा। और जो किसी भूके भाई को खाना खिलायेगा अल्लाह पाक उसे जन्नत के मेवे खिलायेगा। जो किसी प्यासे को पानी पिलायेगा अल्लाह पाक उसे जन्नत का मोहर बंद शरबत पिलायेगा।

आजकल के लोग बस पैसा जमा करने में लगे हैं। एक रुपया गरीबो पर खर्च करने में दस बार सोचते हैं। लाखो रूपए कमाते हैं मगर अल्लाह की राह में खर्च करने में कतराते हैं। वह सोचते हैं की ये जमा पैसा ज़िन्दगी और अच्छी जीने में काम आएगा। सोचो अगर ज़िन्दगी ही न रहे या किसी खतरनाक बीमारी में ही वह सारा पैसा मिनटों में खत्म हो जाये, यह बात कोई नहीं सोचता। खैर क्या हमने कभी सोचा अल्लाह पाक हमारी हर छोटी छोटी ज़रूरते पूरी फरमाता रहता हैं। हमें पानी देता हैं, खाना देता हैं, साँस लेने के लिए हवा देता हैं, जिससे हम ज़िंदा हैं। अगर अल्लाह चाहे तो एक पल में बारिश बंद कर दे, जिससे नदी तालाब सुख जाये और खाना-पानी मिलना बंद हो जाये लेकिन अल्लाह पाक ने कभी ऐसा कुछ नहीं किया क्यूंकि वो बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला हैं। इसी तरह इंसान को भी सोचना चाहिए की अगर खुदा हमे इतना दे रहा हैं तो हम उसके बन्दों को कुछ देने में क्यों पीछे रहे। अगर हम अपने रब की रज़ा के लिए किसी की मदद करेंगे तो हमारा रब भी बहुत खुश होगा और हमें हमेशा दुनिया और आख़िरत की नेअमते अता फरमाता रहेगा।

इंसान की यह सोच गलत हैं की हम जो कमाते हैं, वह सब हमारा ही हैं। ये सोचो की हमें ऊपर वाला रिज़्क़ दे रहा हैं अगर वो बंद कर दिया तो क्या होगा। हमें चाहिए की हम सब का हक़ अदा करने की कोशिश करे। अल्लाह के प्यारे रसूल पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया किसान खेती करता हैं, उसकी फसल में से बहुत से दाने परिंदे चरिन्दे खा जाते हैं। इससे किसान को मायूस नहीं होना चाहिए क्यूंकि जो कुछ जानवर खा जाते हैं। उसके बदले किसान को सदके का सवाब मिलता हैं। जो बहुत बड़ी बात हैं, इसलिए हमें सदक़ा खैरात करते रहना चाहिए। अल्लाह पाक हम सब को सदक़ा खैरात करने की तौफीक अता फरमाए  आमीन । 

बेनमाज़ी की सजा अज़ाब और अंजाम (Benamazi Ki Saza-Azab-Or-Anjam)

बेनमाज़ी की सजा अज़ाब और अंजाम (Benamazi Ki Saza,Azab or Anjam)

अल्लाह के प्यारे रसूल पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं, मुस्लमान और काफिर के बीच फर्क करने वाली चीज़ नमाज़ हैं। जिसने जान बुझ कर नमाज़ को छोड़ दिया गोया उसने काफिर का काम किया। एक और हदीस में प्यारे रसूल पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फरमाते हैं, एक रात मेरे पास दो फ़रिश्ते आये और मुझे अपने साथ लेकर गए। मैंने रास्ते में देखा की एक आदमी ज़मीन पर लेटा हुआ हैं, और एक दूसरा आदमी एक बड़े पत्थर से उसे मार रहा हैं। उसका सिर टुकड़े टुकड़े हो जाता हैं। और पत्थर दूर जा गिरता हैं। जब वह पत्थर लेने के लिए जाता और वापिस आता हैं। इतनी देर में उसका सिर फिर सही हो जाता हैं। वह आदमी फिर अपनी पूरी ताकत से उसके सिर पर पत्थर मारता हैं। इसी तरह वह मारता रहता हैं। मैंने फ़रिश्ते से पूछा यह कौन आदमी हैं? इसका जुर्म क्या हैं? फ़रिश्ते ने जवाब दिया, यह आदमी नमाज़ नहीं पढता था। इसको इसकी सज़ा मिल रही हैं।

प्यारे दीनी भाइयो गौर करो, मस्जिदों में अज़ान की आवाज़ हमारे कानो तक पहुँचती हैं, लेकिन हम सारा काम काज छोड़ कर मस्जिद पहुंचने के बजाय आराम से बैठे टेलीविज़न देखते रहते हैं। अज़ान हो रही होती हैं और हमारा टेलीविज़न चल रहा होता हैं। नमाज़ हो रही हैं और हम फिल्मे, गाने, कार्यक्रम देखने में खोये रहते हैं। जमाअत हो रही होती हैं और हम सड़को, होटलो, चौराहों पर बैठे गप्पे मार रहे होते हैं। न तो हमें अज़ान और नमाज़ की परवाह हैं, और न ही मस्जिद का एहतराम होता हैं।

ताज्जुब की बात तो यह की रमज़ान के महीने में तक ऐसा देखना को मिलता हैं। कुछ लोग इस्लामी लिबास पहन कर घर से निकल जाते हैं लेकिन मस्जिद में नमाज़ पढ़ने की बजाय किसी और महफ़िल में लगे रहते हैं, और वहाँ फ़िज़ूल की दुनियावी बातें करते हैं।

हज़रत औबादा सहाबी फरमाते हैं,अल्लाह के रसूल पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझे 7 चीज़ो की नसीहत फ़रमाई थी। जिसमे से दो चीज़े यह हैं की -शिर्क मत करना नहीं तो तुम्हारे बदन की बोटी बोटी कर दी जाएगी। दूसरा जान बुझ कर नमाज़ न छोड़ना, क्यूंकि ऐसा आदमी इस्लाम से ख़ारिज हो जाता हैं।

ज़रा गौर करो ऐ मुसलमानो जान बुझ कर नमाज़ छोड़ने वाले हम कैसे मुस्लमान कहलाने के हक़दार हो सकते हैं। जब कभी लड़ने की बात आती हैं तो हम पीछे नहीं रहते लेकिन दीन के कामो से दूर क्यों? अल्लाह के वास्ते ऐ मुसलमानो अपना और नमाज़ का रिश्ता मज़बूत कर लो। मस्जिदों को अपने सजदों से आबाद कर दो। अब भी मौका हैं सच्चे दिल से तौबा करके अपने रब को राज़ी कर लो क्यूंकि अगर रब राज़ी हो गया तो दुनिया की कोई भी मुसीबत तुम पर नहीं आ सकती। गरीबी, बेरोज़गारी, मुसीबतो, रंज और गम लाचारी का एक ही इलाज हैं और वो हैं नमाज़ ।

अल्लाह हम सब को पंजवक्ता नमाज़ पढ़ने की तौफीक अता फरमाए आमीन।

इस्लाम में बहन बेटी की हदीस (Behen Beti Ki Hadees in Islam)

बेटियां हमारे लिए अल्लाह की नेअमत व रहमत हैं। लेकिन अफ़सोस आज दुनिया ने अपने गलत ख़यालो और रस्मो की वजह से उन्हें अपने लिए मुसीबत समझ लिया...