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हलाल कमाई की बरकत (Prosperity of Halal Income)

हलाल कमाई की बरकत (Prosperity of Halal Income)

मेहनत से कमाई करके अपने बाल बच्चों की परवरिश करना, घरवालों को मुहताजी से बचाना और खुद भी बचना बहुत बड़ी इबादत ही नहीं बल्कि इस्लाम के पांच रुक्नों के बाद सबसे बड़ी फ़र्ज़ इबादत है। कुरान व हदीस में इसके बारे में सख्त ताकीद आई है अल्लाह पाक फरमाता है, हमने तुम्हें जमीन पर रहने के लिए जगह दी और उसी में तुम्हारे लिए रोज़ी  बनाई (सूरह आराफ़) और सूरह हजर में फरमाया और हमने तुम्हारे लिए वहां रोज़ी के साधन बनाएं और उन्हें भी रोजी दी जिन को तुम खिला पिला नहीं सकते थे।  सूरह बकर में फरमाया- हज के मौके पर भी तुम्हें अपनी रोजी तलाश करने में कोई गुनाह नहीं।

रोजी को अल्लाह पाक ने अपना फ़ज़्ल भी करार दिया और हुक्म दिया- अल्लाह से उसका फ़ज़्ल मांगो(सूरह निसा)

इन आयतों का मतलब यही है कि इंसान दुनिया में फैल कर रोज़ी तलाश करें और अपनी मेहनत और कोशिश से अल्लाह की बिखेरी हुई रोटी को जमा करें, खुद भी खाए, घरवालों की परवरिश करें और दूसरों को भी खिलाएं।

क़ुरआनी आयतो के अलावा हदीसो में भी इसकी सख्त ताकीद आयी है। अल्लाह के रसूल फरमाते हैं- हलाल रोजी कमाना फ़र्ज़  इबादतों के बाद सबसे अहम फ़र्ज़ है।

कयामत के दिन जिस तरह आदमी से फ़र्ज़ इबादतों  के बारे में पूछा जाएगा उसी तरह रोजी के बारे में भी हिसाब लिया जाएगा।  हलाल रोजी कमाने और खाने खिलाने की बरकत यह है कि उसकी बदौलत इंसान की तबीयत नेकी और नेक कामों की तरफ लगती है।  उसे इबादत की तौफीक मिलती है, आंखों में शर्म व हया और चाल में शराफत पैदा हो जाती है, और सबसे बड़ा फायदा तो यह है कि कयामत के दिन उसका चेहरा रोशन होगा। हलाल रोजी कमाने वाले और इस सिलसिले में पेश आने वाली तकलीफों को बर्दाश्त करने वाले अल्लाह से इनाम पाएंगे और उन्हें जन्नत का घर रहने को मिलेगा जबकि हराम रोजी कमाने खाने वाले बड़े घाटे में रहेंगे। पहली बात तो यह कि उन्हें इबादत की तौफीक नहीं मिलेगी, अगर कोई हराम कमाई करने वाला इबादत करेगा तो उसकी इबादत कबूल नहीं होगी। अल्लाह के रसूल ने फरमाया अगर किसी ने 10 रूपए का कोई कपड़ा खरीदा और उसमें एक रुपया भी हराम कमाई का होगा तो जब तक वह कपड़ा बदन पर रहेगा उसे पहनकर नमाज पढ़ेगा तो नमाज़ कबूल नहीं होगी।

हजरत अबू बक्र सिद्दीक रदियल्लाहो अन्हो का बयान है- अल्लाह के रसूल ने फरमाया हराम रोजी से पलने वाला बदन जन्नत में नहीं जाएगा। हराम रोजी से पलने वाला गोश्त तो जहन्नम का ही हकदार है। जो लोग लूट-खसोट, बेईमानी, चोरी, रिश्वत वगैरा जैसे नाजायज वह हराम तरीकों से कमाई करते हैं और उनके बच्चों को पालते हैं, वह दुनिया व आखिरत में गुनाहगार वह सजा के हकदार है। ऐसे लोगों की दुआ कबूल नहीं होती, यही वजह है कि कुछ लोग शिकायत करते नजर आते हैं कि बरसों से दुआ मांग रहा हूं कबूल नहीं हो रही है। इसकी वजह यही है कि पेट में हलाल रोजी नहीं पहुंच रही है या कोई एक लुकमा ही किसी अपने- पराय के पेट में चला गया जिसकी नहूसत से दुआ कबूल नहीं हो रही है। खुदा के लिए खाने पीने का खास  ध्यान रखें हलाल रोजी कमाए और खाएं और उसी के घर का खाए पियें जिसकी रोजी हलाल होने का यकीन हो। दावतों के शौकीन ना बने कहीं जाना पड़े तो सोच समझ कर जाएं की फलाना शख्स किस कमाई से दावत कर रहा हैं लेकिन अफसोस आज इसका ख्याल तो हमारे दीनी रहनुमा और पीर हज़रात  भी नहीं कर रहे हैं, पता है कि मुरीद का कारोबार उल्टा सीधा है लेकिन उसकी नाराजगी के खौफ से उसे कुछ कहने की हिम्मत नहीं करते और आराम से उसके यहां दावत में जाते हैं।

अल्लाह हिदायत दे आमीन

मौत और मैयत के बारे में कुछ ज़रूरी बाते (Some Important Things About Death and Corpse)

मौत और मैयत के बारे में कुछ ज़रूरी बाते (Some Important Things About Death and Corpse)

मोमिन का एहतराम बेहद ज़रूरी हैं, यहाँ तक की फ़र्ज़ हैं उसकी तौहीन करीब करीब कुफ्र हैं, इस्लाम इंसानियत की सारी खूबियां मोमिन में मौजूद होने की ताकीद करता हैं, जिस तरह ज़िन्दगी में मोमिन का अदब व एहतराम ज़रूरी हैं उसी तरह उसके इंतेक़ाल के बाद भी ज़रूरी हैं इसलिए अल्लाह के रसूल ने बड़े ही अदब व एहतराम के साथ मुर्दो को दफ़नाने का हुक्म दिया हैं और कब्रों के ऊपर चलने से मना फ़रमाया हैं।

हदीस शरीफ में हैं जो किसी के जनाज़ा को 40 कदम लेकर चले उसके 40 गुनाहे कबीरा माफ़ हो जाते हैं। जनाज़ा देखने उसे उठाने और लेकर चलने से आदमी को अपनी भी मौत की याद आती हैं कुछ देर के लिए वह सोचता हैं की एक दिन हमारा भी यही हाल होने वाला हैं, मुझे भी अपने रब के दरबार में पेश होना पड़ेगा अपने किये का हिसाब व जवाब देना पड़ेगा मौत की याद से इंसान अगर गम्भीरता से सोचे तो उसकी काया पलट सकती हैं इसी लिए तो ताजदारे अम्बियां पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कब्रों की ज़ियारत किया करो इससे तुम्हे अपनी मौत की याद आएगी, मौत की याद से इंसान अपने गुनाहो से तौबा कर सकता हैं और फिर उसकी ज़िन्दगी एक नए रास्ते पर चलने लगेगी जो आख़िरत में उसकी काफी मदद करेगी।

जनाज़े को कन्धा देना इबादत हैं इस में कोताही नहीं करनी चाहिए हमारे आका ने हज़रत सअद बिन जुरारा रदियल्लाहो अन्हो का जनाज़ा उठाया, सुन्नत यह है की 4 आदमी मिलकर जनाज़ा उठाये एक एक पाया एक एक कंधे पर रहे।
यह भी सुन्नत हैं की पहले दाहिने सिरहाने,फिर दाहिने पैर की तरफ,फिर बाएं सिरहाने और फिर बाएं पैर की तरफ कन्धा दे छोटा बच्चा जो उठाये जाने के काबिल हो उसे हाथ पर उठा कर भी ले जा सकते हैं।

जनाज़ा इस रफ़्तार से लेकर चले की मुर्दे को झटका न लगे,साथ चलने वाले लोग जनाज़े के पीछे चले। औरतो को जनाज़े के साथ जाना नाजायज़ हैं, जनाज़े के साथ अगरबत्ती या लोबान सुलगा कर ले जाना मना हैं, जनाज़ा जब तक रखा न जाये तब तक बैठना मकरूह हैं।
पडोसी रिश्तेदार या किसी नेक मर्द, औरत के जनाज़े में शरीक होना नफ़्ल नमाज़ पढ़ने से अफ़ज़ल हैं जनाज़े में शरीक होने वाले को बिना नमाज़े जनाज़ा पढ़े वापिस नहीं जाना चाहिए।

नमाज़े जनाज़ा फर्ज़े किफ़ाया हैं अगर कुछ लोगो ने पढ़ ली तो सब बरी हो गए और अगर किसी ने नहीं पढ़ी तो जिन जिन लोगो की मौत की  खबर मिली वह सब गुनहगार होंगे जो आदमी नमाज़े जनाज़ा फ़र्ज़ न माने वह काफिर हैं इसके लिए जमाअत शर्त नहीं एक आदमी भी पढ़ लेगा तो फ़र्ज़ अदा हो जायेगा।

आजकल देखा जाता हैं की लोग जूता पहन कर और कुछ लोग जूते चप्पल पर खड़े होकर जनाज़ा की नमाज़ पढ़ लिया करते हैं ऐसी सूरत में जूता और वह ज़मीन जिस पर खड़े होकर नमाज़ अदा की जाये उन दोनों का पाक होना ज़रूरी हैं वरना नमाज़ नहीं होगी।

हर मुस्लमान की नमाज़े जनाज़ा पढ़ी जाएगी अगरचे वह कितना बड़ा गुनहगार क्यों न हो फिर भी कुछ ऐसे लोग हैं जिनकी नमाज़े जनाज़ा नहीं पढ़ी जाएगी जो इस तरह हैं:-
1. बागी (गद्दार )
2.डाकू जो डाका डालते मारा जाये उसे न तो ग़ुस्ल दिया जायेगा और न ही उसकी नमाज़े जनाज़ा पढाई जाएगी
3. जो नाहक की तरफदारी करते हुए मारा जाये
4.जिसने किसी का गला घोंट कर मार दिया हो
5.शहर में रात को हथियार लेकर लूटमार करने वाले भी डाकू की गिनती में आते है अगर इस हालत में मारे जाये तो उनकी नमाज़े जनाज़ा नहीं पढ़ी जाएगी
6.माँ बाप का क़त्ल करने वाले लोग
7.किसी का माल छीनने के दौरान मारे जाने वाले की भी नमाज़ नहीं पढ़ाई जाएगी।

खुदखुशी माना की हराम हैं, लेकिन खुदखुशी करने वाले की नमाज़े जनाज़ा पढ़ी जाएगी आम रास्ते और दुसरो की ज़मीन पर नमाज़े जनाज़ा पढ़ना मना हैं हाँ अगर उसके मालिक से इसकी इजाज़त ली हो तो पढ़ सकते हैं।

मैय्यत को दफ़्न करना फर्ज़े किफ़ाया हैं जहाँ इन्तेकाल हुआ वहीं दफ़्न न करे बल्कि कब्रिस्तान में दफ़्न करना चाहिए कब्र के अंदर चटाई वगैरह बिछाना नाजायज़ हैं मैय्यत को कब्र में रखते वक़्त दुआ पढ़े "बिस्मिल्लाहे व बिल्लाहे अला मिल्लते रसूलिल्लाह "।

मुस्तहब यह हैं की दफ़्न के बाद अलिफ़ लाम मीम से मुफलेहुन तक और आमनर्रसूल से अललकौमिल काफेरिन तक पढ़े ,दफ़्न के बाद तकरीबन आधा घंटा कब्र के पास बैठकर तिलावत करे उसके मगफिरत की दुआ करे और दुआ करे की मुन्कर नकीर के सवालों के जवाब आसानी से दे।
मिटटी देने की दुआ :-
पहली बार मिट्टी डाले तो यह दुआ पढ़े मिन्हा खलकनाकुम
दूसरी बार मिट्टी डाले तो यह दुआ पढ़े-व फ़ीहा नुईदुकुम
तीसरी बार मिट्टी डाले तो यह दुआ पढ़े- व मिन्हा नुखरिजुकुम तारतन उखरा पढ़े

इसका मतलब यह हैं की हमने तुम्हे इसी मिट्टी से पैदा किया और फिर मरने के बाद इसी मिट्टी के हवाले करके और क़यामत में तुम्हे फिर इसी मिट्टी से दोबारा निकालेंगे।

इस्लाम में औरत की अहमियत (Importance of Women in Islam)

इस्लाम में औरत की अहमियत (Importance of Women in Islam)

जैसा की आपको मालूम होगा की पैग़ंबरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दुनिया में तशरीफ़ लाने से पहले अरब के लोग शर्म के मारे लड़कियों को पैदा होते ही ज़िंदा ज़मीन में दफ़्न कर दिया करते थे। क़ुरान शरीफ में भी इसके बारे में यूँ बयान आया हैं की ज़िंदा दरगोर कर दी जाने वाली लड़कियों के बारे में (उन्हें ज़िंदा दफ़न करने वालो से) पूछा जायेगा की किस जुर्म में इन्हे क़त्ल किया गया? पैदा होने वाली बच्ची ने क्या ऐसी खता की थी? खुदा ने जिसे दुनिया में जीने का हक़ देकर भेजा उसे क़त्ल क्यों कर दिया गया ?

अल्लाह के रसूल ने इस लानत को खत्म फरमाने के लिए बड़े ही प्यारे अंदाज़ में लोगो को समझाया की जो आदमी अपनी बेटी को ज़िंदा दफ़्न न करे,उसे अपने लिए तौहीन न समझे, उसे बेटे से कम न समझे, अल्लाह उसे जन्नत में दाखिल फरमाएगा।
    
इस बशारत को सुनने के बाद अरब तबके में काफी तबदीली आयी लोगो ने अपने हाथों से अपनी पैदा हुई लड़कियों को क़त्ल करना छोड़ दिया तो आका ने एक और खुशखबरी सुनाई की जिसके घर 2 लड़कियां पैदा हुई, और घर वालो ने उनकी परवरिश अच्छे ढंग से की उन्हें अच्छी तालीम दी और जवान होने पर उनकी शादी करा दी तो वह मेरे इतने करीब रहेंगे (इतना फरमाते हुए आपने अपनी दो उंगलियों का इशारा फ़रमाया) मतलब बिलकुल करीब।

आका ने लड़कियों की तबियत के बारे में दिलचस्पी लेने के लिए फ़रमाया की घर में खाने पीने की अगर कोई चीज़ बच्चो के लिए लाओ तो पहले  बेटी को दो, फिर बेटो को, किसी भी हाल में बेटी को बेटे से कम मत समझो जो आदमी इसके खिलाफ करेगा क़यामत में उसकी ज़बरदस्त पकड़ होगी मतलब क़यामत के दिन उसके इस काम की सज़ाओ का एलान किया जायेगा जो सज़ाये बहुत ही दिल दहला देने वाली होगी। 

इसी तरह इस्लाम से पहले माँ बाप की जायदाद में औरतो का हिस्सा नहीं था, पैगंबरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनके लिए भी हिस्सा मुक़र्रर फ़रमाया। क़ुरान शरीफ में उनके हिस्सों का बयान बड़ी तफ्सील से आया हैं, जिसकी रौशनी में औरते अपने माँ बाप की जायदाद और बीवियाँ अपने शौहरों की जायदाद में हिस्सेदार मुक़र्रर की गयी इस कानून के नाज़िल होने पहले लोग व रिश्तेदार मरने वाले का माल दबा लिया करते थे।

इस्लाम ने यह भी तालीम दी की मरने वालो की औलाद अगर नाबालिग हो और अपने हिस्से की जायदाद व माल की हिफाज़त करने के काबिल न हो तो ख़ानदान के लोग उसकी हिफाज़त करे और काबिल हो जाने के बाद उन्हें सौंप दे इसी तरह लड़कियों की शादी के बारे में उनकी राय व मंज़ूरी को ज़रूरी करार दिया गया बिना उनकी रज़ामंदी के उनके माँ बाप को भी यह हक़ नहीं की बेटी की शादी उनकी मर्ज़ी से कर दे।

लोग पहले बेवा औरतो से शादी करना पसंद नहीं करते थे, पैगंबरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एक बेवा हज़रत बीबी खदीजा से निकाह फ़रमा कर उस बुरे दस्तूर को भी खत्म कर दिया हालाँकि आप 25 साल के और वह 40 साल की थी। आपने बीवी के साथ अच्छा बर्ताव करने की बार बार ताकीद फ़रमाई और फ़रमाया की तुम में सबसे अच्छा वह हैं जो अपने घर वालो के लिए अच्छा हो। 

आका ने इस्लाम में औरतो पर एक बड़ा एहसान करके उन्हें समाज में बड़ी इज़्ज़त बख्शी और उन्हें क़ाबिले एहतराम करार दिया की जन्नत माँ की कदमो के नीचे हैं की ख़ुशख़बरी सुनाई, बड़े खुशनसीब हैं वह हज़रात जो बेटी, बहन, बीवी, माँ वगैरह जैसी हस्तियों की कद्र करते और उनका हक़ अदा करते हैं हम सभी को चाहिए की औरतो की इज़्ज़त करे उन्हें इज़्ज़त की नज़र से देखे उनका एहतराम करे अगर उन पर कोई ज़ुल्म हो रहा हैं तो उसके खिलाफ आगे आये ज़रूरी नहीं की औरत किस मज़हब की हैं अगर कोई मुसीबत में हैं तो हर मुस्लमान का ज़िम्मेदारी हैं की उनकी मदद करने के लिए हमेशा आगे रहे।

हज यात्रा से जुड़ी कुछ ज़रूरी बातें (Some Important things Related to Hajj Pilgrimage)

हज यात्रा से जुड़ी कुछ ज़रूरी बातें ((Some Important things Related to Hajj Pilgrimage)

पिछली पोस्ट में हमने हज की फ़ज़ीलत के बारे में बात करी थी,आज हम हज यात्रा से जुड़ी कुछ ज़रूरी बातो पर बात करेंगे। हज सन 9 हिजरी में फ़र्ज़ हुआ यह भी इस्लाम का एक रुक्न हैं इसके फ़र्ज़ होने का इंकार करने वाला काफिर हैं। हैसियत वालो पर ज़िन्दगी में एक बार हज करना फर्ज हैं दिखावे के लिए हज करना या हराम कमाई की कमाई से हज करना हराम हैं। हज फ़र्ज़ होने पर उसी साल हज के लिए जाना फ़र्ज़ हैं और देर करना गुनाह हैं हज फ़र्ज़ हो गया लेकिन हज नहीं किया गया यहाँ तक की माल खत्म हो गया तो ऐसी हालत में क़र्ज़ लेकर हज के लिए जाना ज़रूरी हैं।
हज वाजिब होने की कुछ शर्ते हैं जैसे,
1.मुसलमान होना 2.बालिग होना 3.आकिल होना (मजनू,पागल पर हज फ़र्ज़ नहीं) 4.आज़ाद होना(गुलाम पर हज फ़र्ज़ नहीं) 5.तंदरुस्त होना(अपाहिज और अंधे वगैरह पर हज फ़र्ज़ नहीं और इन्हे अपनी तरफ से हज पर भेजना भी वाजिब नहीं 6.सफर खर्च का मालिक होना 7.औरत के लिए महरम होना
जिसके अंदर यह सारी बातें पायी जाये उसे हज के लिए जाना ज़रूरी हैं वह जितनी देरी करेगा उतना गुनहगार होगा और अगर बिना हज किये चल बसा तो उसका ईमान खतरे में हैं।
हज में तीन फ़र्ज़ हैं
1.एहराम
2.वकूफ़े अरफ़ा (ज़िल हिज्जा की 9 तारीख को सूरज ढलने से 10 वी की सुब्हे सादिक से पहले तक किसी वक़्त अरफ़ात  में ठहरना।
3.तवाफ़े ज़ियारत इससे पता चला की बगैर एहराम बांधे हज नहीं हो सकता अगर कोई आदमी 9 तारीख को मैदाने अरफ़ात में न पहुँच सके तो उसका हज नहीं होगा और जो आदमी तवाफ़े ज़ियारत न कर पाए तो उसका हज नहीं होगा।

हज पर जाने वालो को चाहिए की सफर पर रवाना होने से पहले हज के मसायल की जानकारी हासिल कर ले ताकि कोई ऐसी गलती न हो पाए जिससे की सारी मेहनत व पैसा बेकार हो जाये अफ़सोस है की आज कल इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाता आजकल पैसा खूब हो गया हैं तो लोगो को हज करने का शौक लग गया हैं मगर अफ़सोस की हज के अरकान की अदाएगी के बारे में मसायल सिखने की फ़िक्र कम ही लोगो को होती हैं यहाँ तक की अक्सर हाजियो को तलबिया (लब्बैक) भी याद नहीं होता अल्लाह उन्हें तौफीक दे।

फ़र्ज़ अरकान अदा करने में कोताही होने पर हज नहीं होता लेकिन हज के वाजिबात में से अगर कोई वाजिब किसी वजह से छूट जाए तो जानवर ज़िबह करना वाजिब हो जाता हैं जानवर ज़िबह करने से कमी पूरी हो जाती हैं जैसे की नमाज़ में वाजिब छूटने पर सज्दए सहव करने से नमाज़ सही हो जाती हैं।

हज के वाजिबात कुछ इस तरह हैं
1.मीक़ात या उससे पहले एहराम बांधना (यहाँ मीक़ात का मतलब एक तरह की सीमा हैं जहाँ हज यात्रियों को एहराम बांधना होता हैं)
2.सफ़ा-मर्वा के बीच सई करना (काबा से कुछ दूरी पर स्थित सफा और मर्वा की पहाड़ियों के बीच सात बार चलने की भक्ति क्रिया को सई कहा जाता है।
3.सफा पहाड़ी से शुरू करना
4.अगर कोई मज़बूरी न हो तो पैदल सई करना)
5.अरफ़ात से सूरज डूबने के बाद मुज़्दलेफा के लिए निकलना
6.मुज़्दलेफा में ठहरना (यह एक तरह का खुला स्थान हैं जहाँ हज यात्री ठहरते हैं यह हज की एक प्रक्रिया में शामिल हैं)
7.मगरिब व ईशा की नमाज़ मुज़्दलेफा में पढ़ना
8.शैतान को कंकरी मारना
9.दस तारीख को कंकरी मार कर बाल कटवाना
10.हुदूदे हरम में ही क़ुरबानी करना
11.हतीम के बहार से तवाफ़ करना
12.बावज़ू तवाफ़ करना
13.तवाफ़ के बाद 2 रकत नमाज़ पढ़ना (अगर तवाफ़ के बाद नमाज़ नहीं पढ़ी जाती तो दम (जानवर की क़ुरबानी) वाजिब नहीं लेकिन गुनहगार होगा
14.पहले शैतान को कंकरी मारना फिर सर के बाल उतरवाना अगर इसमें कोई काम आगे पीछे हो गया तो दम (जानवर ज़िबह करना पड़ेगा)
15.विदाई तवाफ़ करना भी वाजिब हैं मक्का शरीफ से रवानगी के वक़्त अगर औरत नापाक हो तो उसके लिए माफ़ हैं इसके अलावा भी ज़रूरी मसायल हैं जिन्हे मालूम करना बहुत ज़रूरी हैं।

मीक़ात से बाहर से आने वाले मक्का शरीफ पहुँच कर जो पहला तवाफ़ करते हैं उसे तवाफ़े कुदूम कहा जाता हैं।

तवाफ़ के शुरू के पहले तीन फेरो में एहराम की चादर दाहिने कंधे के नीचे से निकाल कर बाएं कंधे पर डाली जाती हैं दाहिना कन्धा खुला रखा जाता हैं और तीन फेरो में रमल (एक प्रकार की प्रथा) किया जाता हैं कुछ लोग सातों फेरो में कन्धा खुला रखना ज़रूरी समझते हैं यह बात सही नहीं इसी तरह एहराम की हालत में नमाज़ पढ़ने के दौरान एहराम की चादर से दोनों कंधो को ढका रखना चाहिए सई के दौरान भी दोनों कंधे ढके रहने चाहिए।

उमरा का एहराम बांधने के बाद एहराम की हालत में सबसे बेहतरीन वज़ीफ़ा तलबिया हैं इसका सिलसिला तवाफ़ करने से पहले तक जारी रखना चाहिए और हज के दौरान लब्बैक का सिलसिला 10 तारीख को बड़े शैतान को कंकरी मारने से पहले तक जारी रखना चाहिए।

बुरी नज़र का रूहानी इलाज (Spiritual Treatment of Evil Eye)

बुरी नज़र का रूहानी इलाज (Spiritual Treatment of Evil Eye)
अल्लाह  पाक ने तरह तरह  की बीमारिया पैदा फ़रमाई है और उनकी दवाये भी पैदा फ़रमाई है इंसान अपने इलाज और कोशिश से नई नई बीमारिया की नई नई दवाये तलाश करके अपना इलाज करा रहा है लेकिन कुछ बीमारिया ऐसी है जिनका इलाज किसी दवा से नहीं हो सकता उनके लिए रूहानी इलाज ही कारगर साबित होता है, यही वजह है की इंसान कभी कभी बरसो तक अलग अलग हकीमो और डाक्टरों से इलाज कराने के बाद भी अच्छा नहीं हो पाता है उनकी बीमारी का इलाज क़ुरान और सुन्नत की रौशनी में ही मुमकिन होता हैं। यही वजह हैं की कामिल हज़रात इल्मे अमल से ऐसी बीमारियों का इलाज कर दिया करते हैं यही नहीं क़ुरान व हदीस में बयान तरीको और दुआओ को काम में लेकर मरीज़ खुद अच्छा हो सकता हैं।

आपने अक्सर सुना होगा परेशानी का शिकार शख्स कहता हैं किसी ने कुछ करा (जादू टोना) दिया हैं किसी की नज़र लग गयी हैं वगैरह वगैरह यह तकलीफे हम चाहे तो खुद दूर कर सकते हैं और ऐसी भी तदबीरें हैं की कभी इसके शिकार ही न हो उसके लिए हमें क़ुरान व सुन्नत की तालीम पर अमल करना होगा।
आज देखा जाता हैं की लोग किसी की तरक्की सहन नहीं कर पाते दिल ही दिल में उससे जलते हैं उसको नुकसान पहुँचाने की कोशिश में लगे रहते हैं, उनकी तरक्की को रोकने के लिए तरह तरह के जादू टोना करने वाले लोगो की मदद लेते हैं किसी की तरक्की खुशहाली को देखकर जलने वालो को हासिद कहा जाता हैं हासिद की नज़र बड़ी खतरनाक होती हैं इस मुसीबत से बचने के लिए अल्लाह पाक ने सूरह फ़लक नाज़िल फ़रमाई हैं जिस को पढ़ कर आप ऐसे नुक़्सानो से बच सकते हो।
      हासिद के अलावा बुरी नज़र तो एक आम आदमी की भी लग सकती हैं। लोग अपने बच्चो को इमाम साहब वगैरह के पास लेकर जाते हैं और कहते हैं, बच्चा दूध नहीं पी रहा हैं हर वक़्त रोता रहता हैं, तो इमाम साहब सूरह फ़लक और सूरह नास पढ़कर दम कर देते हैं उसके कुछ देर बाद बच्चा सही हो जाता हैं नज़र का असर खत्म हो जाता हैं। नज़र का असर से इंसान आसमान से ज़मीन पर आ सकता हैं, कहने का मतलब दौलतमंद से फ़क़ीर भी बन सकता हैं यहाँ तक की नज़र के असर से इंसान मौत तक पहुँच सकता हैं कई बार आपने सुना होगा बड़े बड़े पैसे वाले लोग रास्ते पर आ जाते हैं उन्हें खतरनाक बीमारियां लग जाती हैं सारा पैसा चंद दिनों में खत्म हो जाता हैं ये कई बार किसी की बुरी नज़र लगने से होता हैं
किसी को नज़र न लगे उसके लिए हमे चाहिए की जब हम कोई अच्छी शक्ल सूरत या चीज़ वगैरह देखे तो माशाअल्लाह या बारकल्लाह कह दे ऐसा कहने से अपनी नज़र नहीं लगेगी।
अगर कोई नज़र का शिकार हो गया हैं तो उसके सर पर हाथ रखकर यह दुआए  पढ़े,

1.कुल आऊजू बिरब्बिल फलक मीन शर्री मा खलक़ वा मीन शर्री गासीकीन ईज़ा वाक़ब वा मीन शर्रिन नफ्फासाती फील उक़द वा मीन शर्री हासीदीन ईज़ा हसद(सूरह फ़लक)

2.बिस्मिल्लाहे अरकीका,वल्लाहो यशफीका मिनकुल्ले दाइन यूजीका व मिन कुल्ले नफ़सिन औ ऐनिन हासिद-अल्लाहो यशफीका बिस्मिल्लाहे अरकीका

3.बिस्मिल्लाहे युबरीका मिन कुल्ले दाइन यशफीका व मिन शर्रे हासिदिन इज़ा हसद व मिन शर्रे कुल्लाज़ी एन

4.अल्लाहुम्मा रब्बनास अज़हबिल बास,वाशफे अन्तश शाफी,ला शिफ़ आ इल्ला शिफाअक शिफ़अन ला युगदीरो सकमा
 
                    इंशाअल्लाह नज़र का असर खत्म हो जायेगा।



जुमा की नमाज़ की अहमियत (Importance of Juma Namaz)

जुमा की नमाज़ की अहमियत (Importance of Juma Namaz)

इस्लाम में जुमा की नमाज़ को काफी खास माना गया हैं इस दिन नमाज़ पढ़ने से अल्लाह उस हफ्ते के गुनाहो को माफ़ कर देता हैं, इस दिन अल्लाह अपने बन्दों पर मेहरबान रहता हैं और उनकी सारी गलतियों को माफ़ कर देता हैं, इसलिए इस दिन काफी तादाद में लोग जुमे की नमाज़ अदा करने आते हैं जुमा की नमाज़ का वक़्त वही है जो ज़ोहर की नमाज़ का होता हैं। 

जुमा के लिए खुतबा शर्त है बिना खुतबा पड़े जुमा की नमाज़ नहीं होगी जो शख्स खुतबा न पड़े सके वह जुमा की नमाज़ में इमाम नहीं हो सकता खुतबा के लिए जो इमाम मुकर्रर है, अगर उनकी इजाजत के बिना कोई दूसरा आदमी खुतबा पड़ दे तो नमाज़ नहीं होगी। खुतबा जबानी या देखकर पड़ा जा सकता है, खुतबा अरबी में ही पड़ा जाए जो काम नमाज़ की हालत में करना हराम या मना है खुतबा की हालत में भी हराम व मना है खुतबा सुनना फर्ज है अगर आवाज न पहुंचे तो भी खामोश रहना और खुतबा  की तरफ ध्यान रखना वाजिब है। खुतबे के दोरान इधर उधर गर्दन फेर कर देखना गुनाह है खुतबे में सरकार का नाम आये तो अंगूठे न चूमे बल्कि दिल ही में दुरुद शरीफ पड़े ले खामोश रहना फ़र्ज़ है इमाम खुतबा पड़ रहा हो तो कोई वजीफा पड़ना जायज नहीं। 
जुमा का खुतबा नमाज़ से पहले पड़ना फ़र्ज़ है अगर बाद में पड़ा तो नमाज़ नहीं हुई।  

जुमे की नमाज़ में कुल 14 रकात होती हैं जो इस तरह होती हैं 4 सुन्नत जो हमें पढ़ने होती हैं जो फ़र्ज़ नमाज़ से पहले पढ़ी जाती हैं उसके बाद 2 फ़र्ज़ जो इमाम पढ़वाता हैं उसके बाद 4 सुन्नत फिर 2 सुन्नत और 2 नफ़्ल जिसे हमें फ़र्ज़ नमाज़ के बाद पढ़ना होता हैं इस तरह 14 रकात पढ़ी जाती हैं। 

जुमा की नमाज़ हो जाने के बाद जुमा या ज़ुहर की दूसरी जमाअत नहीं हो सकती सब अपनी अपनी नमाज़ अकेले अकेले पढ़े। एक मस्जिद में दो जुमा नहीं हो सकते अगर मुक़र्रर इमाम ने जुमा की नमाज़ पढ़ा दी बाद में कुछ लोग आये और उन्होंने जमाअत से जुमा की नमाज़ किसी और इमाम के पीछे पढ़ ली तो उनकी नमाज़ नहीं हुई। 

खुतबा से पहले जो 4 रकात सुन्नत नमाज़ पढ़ी जाती हैं अगर किसी वजह से नमाज़ पहले न पढ़ा तो बाद में सुन्नत की नियत से पढ़े
जुमा के दिन की गयी नेकी 70 गुना नेकी के बराबर होती हैं, इसलिए हम सभी को जुमा की नमाज़ पाबन्दी से पढ़नी चाहिए।   

खाने पीने का इस्लामी तरीका (Islamic Way of Eating Food)

खाने पीने का इस्लामी तरीका (Islamic Way of Eating Food)
इस्लाम में हर काम के लिए इस्लामी तरीका तय किया गया हैं जिसे अपनाने पर दुनिया व आख़िरत के बेशुमार फायदे हैं। खाने खाने से पहले हाथ धोना तो सुन्नत हैं ही,अगर वज़ू कर लिया जाये तो उसकी बरकत से गरीबी,मुहताजी दूर हो जाएगी। दूसरा बेहतर तरीका यह है की घर वाले साथ मिल बैठकर खाना खाये प्यारे आका फरमाते है- अल्लाह को यह बात बहुत पसंद हैं की किसी मोमिन बन्दे को बीवी बच्चो के साथ दस्तरख्वान पर एक साथ खाना खाते देखे क्यूंकि जब सब दस्तरख्वान पर मिल बैठकर खाते हैं, तो अल्लाह पाक उन्हें रहमत भरी नज़रो से देखता हैं। खाना खाने से पहले हाथ धोना सुन्नत हैं हाथ धोने से कई बीमारियों के जरासीम (कीटाणु ) खत्म हो जाते हैं। अपने हाथो को धोने के बाद तौलिये से न पोछे   बल्कि खाने के बाद धोये तो ज़रूर पोछे।

खाना खाने से पहले बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम ज़रूर पढ़े ताकि खाने में बरकत हो और शैतान शरीक न हो सके क्यूंकि जिस खाने पर बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम नहीं पढ़ी जाती वह खाना शैतान के लिए हलाल हो जाता हैं, अगर कभी किसी वजह से शुरू में बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम पढ़ना भूल जाये तो याद आते ही बिस्मिल्लाहे औवलहु व आखिरहु पढ़ लिया करे।
खाना खाये तो सीधे हाथ से पानी पिए तो सीधे हाथ से बाएं हाथ से खाना पीना शैतान का काम हैं। 

दस्तरख्वान पर गिरे हुए रोटी चावलों वगैरह के टुकड़ो को खा लेना सुन्नत हैं, इसमें बरकत ही बरकत हैं वरना उसे शैतान खायेगा प्यारे आका फरमाते हैं, रोटी की कद्र व इज़्ज़त करो,वह आसमान व ज़मीन की बरकतो में से एक बरकत हैं जो शख्स या औरत दस्तरख्वान पर गिरी रोटी उठाकर खा लेगा वह बख्श दिया जायेगा। 
खाने के बाद उंगलियों को चाटकर बर्तन को उंगलियों से साफ़ कर देना भी सुन्नत हैं ऐसा करने वालो के लिए वह बर्तन दुआ करता हैं की जिस तरह तूने मुझे साफ़ करके शैतान की खुराक बनने से बचाया,अल्लाह पाक तुम्हे जहन्नम के अज़ाब से बचाये।

नंगे सर खाने पिने से परहेज़ करना चाहिए भर पेट खाना खाना नुकसानदेह साबित होता हैं हवा पानी के लिए जगह खाली रखना ज़रूरी हैं। पानी भी तीन साँस में पिए यह अल्लाह की बहुत बड़ी नेअमत हैं इसलिए पानी पिने के बाद अल्हम्दुलिल्लाह पढ़कर अल्लाह का शुक्र अदा करे। 
खाना खाने के बाद अल्हम्दुलिल्लाह हिल्लज़ी अतअमना व सकाना व जअलना मिनल मुस्लेमीन पढ़कर अल्लाह का शुक्र अदा करे।

अज़ान की अहमियत और फ़ज़ीलत (Importance and Superiority of Azan)

अज़ान की अहमियत और फ़ज़ीलत (Importance and Superiority of Azan)

अज़ान का मतलब हैं खबर देना या एलान करना इस्लामी शरीयत की ज़बान में अज़ान उन अल्फाज़ो को कहा जाता हैं जिनसे लोगो को खबर दी जाती हैं की नमाज़ का वक़्त हो चुका हैं मस्जिद में आये और जमाअत से नमाज़ अदा करे। फ़र्ज़ नमाज़ो को अदा करने के लिए अज़ान देना सुन्नत हैं। जिस बस्ती से अज़ान की आवाज़ आये तो मालूम चल जाता हैं की यहाँ के रहने वालो में मुस्लमान भी हैं यही वजह है की सरकार या सहाबा जब जिहाद के लिए मदीना से बाहर तशरीफ़ ले जाते तो जिस बस्ती से अज़ान की आवाज़ सुनते तो अन्दाज़ा लगा लिया करते की यहाँ मुसलमान रहते हैं।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर का बयान हैं की जब हम मक्का से हिजरत करके मदीना आये तो लोगो को नमाज़ के लिए जमा करने की तरकीब के बारे में सोच विचार करने लगे, लोगो ने अपनी अलग अलग राय पेश की कुछ सहाबा ने रात को ख्वाब में फ़रिश्तो की ज़बानी कुछ ऐसे अल्फ़ाज़ सुने जिन्हे जब उन्होंने अल्लाह के रसूल से बयान किया तो आका बहुत खुश हुए और हज़रत बिलाल को बुलाकर फ़रमाया ! अब नमाज़ के वक़्त तुम यही अल्फ़ाज़ बुलंद आवाज़ से अदा किया करो चुनांचे वही अल्फ़ाज़ क़यामत तक के लिए अज़ान बन गए जो पूरी दुनिया में अदा किये जाते हैं।

हज़रत मुआविया रदियल्लाहो अन्हो का बयान हैं की मैंने अल्लाह के रसूल पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फरमाते हुए सुना हैं की क़यामत के दिन अज़ान देने वालो की गर्दने सबसे ऊँची होगी इस बात से पता चल जायेगा की यह लोग दुनिया में अज़ान पढ़ा करते थे। अल्लाह की तरफ से अज़ान पढ़ने वालो के लिए बहुत बड़ा ऐजाज़ होगा।

इसी तरह एक और हदीस में आया हैं की मुअज़्ज़िन (अज़ान देने वाला) की आवाज़ जहाँ तक पहुँचती हैं वहां तक की सारी चीज़े जैसे इंसान, जिन्न और दूसरी मखलूक सभी क़यामत के दिन उसके ईमान की गवाही देंगे।
अज़ान की आवाज़ सुनते ही खामोश हो जाये और अज़ान के कलेमात का जवाब दे अज़ान का जवाब देना वाजिब हैं अगर कई कई मस्जिदों से अज़ान की आवाज़ सुनाई दे तो सिर्फ एक ही अज़ान का जवाब देना काफी हैं। खुलूसे दिल से अज़ान का जवाब देने वालो को अल्लाह के रसूल ने जन्नत की बशारत दी हैं।

       लिहाज़ा जब भी अज़ान हो हम सभी को कुछ देर के लिए अज़ान सुनने और उसका जवाब देने के लिए तैयार रहना चाहिए और नमाज़ की पाबन्दी करनी चाहिए।

इस्लाम में सलाम की अहमियत (Importance of Salam in Islam)


इस्लाम में सलाम की अहमियत (Importance of Salam in Islam)

इस्लामी शरीयत में सलाम करने की बड़ी अहमियत हैं सलाम करना सुन्नत हैं और इसका जवाब देना वाजिब हैं अल्लाह के प्यारे रसूल पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सहाबा को सलाम आम करने की तालीम दी।

सलाम (अस्सलाम अलैकुम) कहना हमारी इस्लामी पहचान हैं आज जबकि हमारी इस्लामी पहचान खत्म होती जा रही हैं चेहरों से सुन्नते (दाढ़ी) खत्म होती जा रही हैं अपने जान पहचान वालो को तो पहचाना जा सकता हैं लेकिन अपने दूसरे दीनी भाइयो की पहचान मुश्किल हो चुकी हैं। ऐसे नाज़ुक माहौल में अगर हम सलाम को भी अपने समाज से रुखसत कर देंगे तो कितना बड़ा सितम होगा।

सलाम एक दुआ हैं जो हम अपने किसी दीनी भाई को देते हैं और जवाब में खुद भी उसकी तरफ से दुआ पाते हैं आपने अपने मिलने वाले से अस्सलामो अलैकुम कहा तो मतलब यह हुआ की ऐ मेरे दीनी भाई आप पर सलामती हो,अल्लाह आपको सलामत रखे आपकी ये दुआएं सुनकर सामने सामने वाला भी आपको दुआएं देते हुए जवाब देता हैं वाअलैकुम अस्सलाम व रहमतुल्लाहे व बरकतहु मतलब यह हैं की ऐ मुझे सलामती की दुआ देने वाले मेरे भाई तुम पर भी अल्लाह की सलामती हो अल्लाह पर तुम पर रहम फरमाए अपनी रहमतो और बरकतो से नवाज़े!

लेकिन आज के इस दौर में हम सलाम का मतलब व मकसद भूल बैठे हैं और इसे एक तरह की रस्म समझ लिया हैं और जब कोई हकीकत रस्म बन जाती हैं फिर उसकी बरक़तें खत्म हो जाती हैं आज के माहौल में तो लोग यह समझ बैठे हैं की सलाम करना तो छोटो और गरीबो का हक़ हैं बड़े और बड़ो को सलाम करना ज़रूरी नहीं हाल यहाँ तक हो गया हैं की बड़े लोग छोटो को सलाम करना अपनी तौहीन समझने लग गए हैं इसलिए जब कोई छोटा उन्हें सलाम करता हैं तो सीधे मुँह जवाब में वालेकुम सलाम कहना भी मुनासिब नहीं समझते।

बहरहाल सलाम करने के फायदे बेशुमार हैं हज़रात आदम अलैहिस्सलाम ने फ़रिश्तो को सलाम किया और फ़रिश्तो ने जवाब दिया यह ज़रूरी नहीं की हम जिसे पहचानते हो उसे ही सलाम करे जी नहीं, अपने हर दीनी भाई को चाहे उसे पहचानते हो या नहीं इस रिश्ते से की वह आपका दीनी भाई हैं आपको सलाम ज़रूर करना चाहिए और सलाम के लिए कम से कम अस्सलामो अलेकुम तो कहना ही चाहिए।

आज कल का ज़माना बड़ा तेज़ रफ़्तार ज़माना हैं ज़िन्दगी एक मशीन की तरह हो गयी हैं किसी को फुर्सत नहीं इसलिए रास्ता चलते हाथ उठाकर मुसकुराकर सर झुकाकर सलाम करने की रस्मे निभाई जा रही हैं इससे इतना तो समझा जा सकता हैं की सामने वाले ने मुझे सलाम किया या मेरे सलाम का जवाब दिया लेकिन इससे सलाम की बरक़तें हासिल नहीं होगी लेकिन क्या किया जाये फुरसत नहीं हाँ शिकायत ज़रूर दूर हो जाएगी की फलां शख्स मेरे सामने से गुज़रा लेकिन सलाम नहीं किया क्यूंकि अब तो खाली रस्मे निभाने का ज़माना ही रह गया हैं हक़ीकते तो रुखसत होती जा रही हैं।

सलाम करना तौहीन नहीं बल्कि इज़्ज़त हैं समझदार लोगो की नज़र में भी और अल्लाह और रसूल की नज़रो में भी सलाम करने वाला कौम की नज़रो में कबीले एहतराम होता हैं सलाम सादगी की पहचान हैं,
अगर कोई बड़ा आदमी जो किसी भी ऐतबार से बड़ा हो उम्र दौलत इल्म किसी भी ऐतबार से अगर लोगो से सलाम करने में पहल करे तो लोग उसे अदब व एहतराम की नज़रो से देखेंगे और अगर वही आदमी सलाम न करे तो कहेंगे की कितना घमंडी आदमी हैं सलाम करने की भी तौफीक नहीं इसे!

बहरहाल सलाम हर ऐतबार से हमारे लिए रहमत हैं दीन के ऐतबार से भी और दुनिया के ऐतबार से भी इसलिए हम सभी को अपनी इस्लामी शान बनाये रखने के लिए अपने रसूल के फरमान की रौशनी में सलाम को आम करना चाहिए।

नमाज़ की बरकते (Prosperity of Namaz)

नमाज़ की बरकते (Prosperity of Namaz)

नमाज़ एक इबादत हैं जो हर बालिग मर्द और औरत पर फ़र्ज़ हैं दुनिया व आख़िरत में इसकी बेशुमार बरकते हैं आज की मेडिकल साइंस में नए नए अंदाज़ में इसकी बरकते और फायदे बताये गए हैं जिन्हे समझकर लोग इस्लाम के करीब आ रहे है और जिनके नसीब में इस्लाम की दौलत मुकद्दर हो चुकी है। वह इस नेअमत को हासिल कर लेते हैं एक मशहूर लेखक ने अपनी किताब Phenomena of Spiritualism में लिखा हैं की लालच, झूठ ,जलन,बदला लेने की भावना ऐसी बहुत सी ख़राब बातें हैं जिनसे बहुत सारी बीमारियां पैदा हो जाती हैं यह सारे गैर अख़लाक़ी काम नमाज़ की बरकत से दूर हो जाते हैं।

मशहूर लेखक Vice admiral William Usborne Moore ने अपनी किताब The Voices में कहा हैं की अगर रूहानी मुकाम हासिल करना चाहते हो तो नमाज़ पढ़ो।

जब इमाम तिलावत करता हैं और मुक्तदी ध्यान के साथ सुनते हैं तो पढ़ने और सुनने वालो के बीच एक खास तरह की लहर पैदा हो जाती हैं और ये लहरें दोनों के बीच नूर पैदा करती हैं इमाम के द्वारा बोले गए क़ुरान के हर लफ्ज़ की बरकत से मुक्तादियो की बहुत सी रूहानी बीमारियों का खात्मा हो जाता हैं नमाज़ में तिलावत की लहरें ब्लड कैंसर का भी खात्मा करती है।

औरतो के लिए हुक्म हैं की वह सज्दे में कुहनियो को न फैलाये बल्कि उनकी कुहनियां बदन के साथ लगी रहे इस में हिकमत यह हैं की ऐसा करने से उनके जिस्म पर बहुत अच्छा असर पड़ता हैं।

क़ुरान की फ़ज़ीलत (Superiority of Quran)

क़ुरान की फ़ज़ीलत (Superiority of Quran)

क़ुरान शरीफ अल्लाह का कलाम हैं हिदायत का सामान हैं,सिरते मुस्तकीम हैं, अल्लाह की रहमत हैं, इसकी रौशनी में इंसान अपनी ज़िन्दगी का मकसद समझता हैं इसके वसीले से बन्दा अपने रब से कलाम करता हैं यह रूह की ग़िज़ा और दिल की शिफा,अक्ल की रहनुमा, इल्म का खज़ाना, आँखों का नूर, दिन का चैन व सुरूर और चिरागे मंज़िल हैं।
इसकी बदौलत मोमिनो मुत्तकियो और अल्लाह के नेक बन्दों को खुदा की मुहब्बत नसीब होती हैं क़ुरान से बन्दा अपने रब के करीब होता हैं उसे रूहानी सुकून और अपनी ज़िन्दगी में मिठास नसीब होती हैं जिसे लफ्ज़ो में बयां नहीं किया जा सकता।

क़ुरान पढ़ने की फ़ज़ीलत 

क़ुरान मजीद की तिलावत की बरकत से मोमिनो को इज़्ज़त, रहमते इलाही और कामयाबी नसीब होती हैं एक मोमिन बन्दा जब क़ुरान की आयतो को पढ़ता या सुनता हैं जिसमे अल्लाह पाक ने अपने बन्दों को तरह तरह की नेअमतें अता फरमाने का वादा फ़रमाया हैं तो उसकी रूह ख़ुशी के मारे झूम उठती हैं और जब उन आयतो को पढ़ता या सुनता हैं जिसमे उसने नाफ़रमानो को सज़ाये देने का बयां फ़रमाया हैं तो वह ख़ौफ़े इलाही से कांपने लगता हैं आँखों से आंसुओ की झड़ी लग जाती हैं।
घर चाहे जितना खूबसूरत और आबाद हो लेकिन अगर उसमे क़ुरान की तिलावत न होती हो तो वह घर अल्लाह की नज़र में खंडहर और वीरान घर कहलाता हैं।
अल्लाह के प्यारे रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इसकी अहमियत बयान फरमाते हुए इरशाद फरमाते हैं जिसके दिल में क़ुरान का कोई हिस्सा नहीं मतलब जिसे क़ुरान की कोई भी सुरते आयते न याद हो वह उजड़े हुए घर की तरह हैं इसलिए क़ुरान की तालीम को आम फरमाने पर ज़ोर देते हुए प्यारे रसूल ने फ़रमाया हैं की सबसे अच्छा आदमी वह हैं जो क़ुरान शरीफ पढ़े और दुसरो को भी पढाये सिखाये।
अगर हम अल्लाह का करीबी बन्दा बनना चाहते हैं तो उसके लिए बेहतरीन सहारा व वसीला क़ुरान शरीफ हैं जो शख्स जितने अदब व खुलूस से क़ुरान शरीफ की तिलावत करता हैं वह उतनी देर तक अपने रब से बात करता हैं क़ुरान की तिलवात करने से रहमते नाज़िल होती हैं घर में हो रही परेशानी दूर हो जाती हैं मुश्किल से मुश्किल काम आसान हो जाते हैं अल्लाह तआलाह हमे क़ुरान मजीद की तिलवात की करने की तौफीक अता फरमाए आमीन।

हज और उमराह की फ़ज़ीलत (Superiority of Hajj and Umrah)

हज और उमराह की फ़ज़ीलत (Superiority of Hajj and Umrah)
                                             
   पिछली पोस्ट में हमने इस्लाम के पांच प्रमुख स्तम्भों में से एक स्तम्भ हज क्या हैं के बारे में बताया था, आज हम इसकी फ़ज़ीलत के बारे में बात करेंगे। हज़रत अली शेरे खुदा फरमाते है अल्लाह के रसूल ने फ़रमाया की जिसके पास हज के सफर का ज़रूरी सामान हो,जाने आने के लिए पैसो का इंतेज़ाम हो जिस्मानी हालत अच्छी हो इतना सब कुछ होते हुए भी जो हज न करे तो फिर कोई फर्क नहीं की वो यहूदी होकर मरे या ईसाई होकर ऐसा इसलिए कहा गया हैं क्यूंकि अल्लाह का फरमान हैं जो लोग हज करने की हैसियत रखते हो उनके लिए फ़र्ज़ हैं की वह हज करे।

एक हदीस हैं की हज़रत अबदुल्लाह बिन मसऊद फरमाते हैं की हज और उमराह गरीबी मुहताजी और गुनाहो को इस कदर दूर कर देते हैं जिस तरह लोहार और सुनार की भट्टी लोहे, सोने, चांदी का मैल कुचैल दूर कर देती हैं। हज और उमराह पर जाने वाले अल्लाह के खास मेहमान हैं अगर वह अल्लाह से दुआ करें तो अल्लाह उनकी दुआ कबूल फरमाता हैं और उनके गुनाहो को माफ़ कर देता हैं। हाजियो पर अल्लाह की खास इनायत होती हैं। 

हदीस शरीफ में हैं की अल्लाह तआलाह रोज़ाना अपने हाजी बन्दों के लिए 120  रहमतें नाज़िल फरमाता हैं 60  रहमतें उनके लिए होती हैं जो तवाफ़ करते रहते हैं। 40  रहमतें हरम शरीफ में नमाज़ पढ़ने वालो के लिए और 20  रहमतें काबा शरीफ को देखने वालो के लिए होती हैं तवाफ़ की फ़ज़ीलत बयान फरमाते हुए अल्लाह के रसूल ने फ़रमाया की जिसने 50 बार बैतुल्लाह शरीफ का तवाफ़ कर लिया वह शख्स गुनाहो से ऐसे पाक हो गया जैसे की आज ही अपनी माँ के पेट से बाहर आया हैं।

हलाल और हराम कमाई (Halal and Haram Income)

हलाल और हराम कमाई (Halal and Haram Income)

हलाल और हराम में फर्क समझकर ज़िन्दगी गुज़ारना हर मुस्लमान का फ़र्ज़ हैं हलाल कमाई में जहाँ बेशुमार फायदे हैं वही हराम की कमाई तबाही और बर्बादी का सामान हैं।

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम का फरमान हैं की जो शख्स हलाल रोज़ी कमाता हैं और हराम की कमाई से दूर रहता हैं अल्लाह उसके दिल को अपने नूर से रोशन कर देता हैं दूसरी और जो  शख्स हराम की कमाई करके उस कमाई को सदका और खैरात में देता हैं उसका वह सदका अल्लाह की तरफ से कबूल नहीं किया जाता अगर वह उस कमाई को खर्च करता हैं तो उस कमाई में बरकत नहीं होती और अगर वो उस कमाई को छोड़ कर मर जाये तो वह कमाई जहन्नम का सामान बन जाती हैं हराम की कमाई करने वाले की कोई दुआ कबूल नहीं की जाती बल्कि उस पर अल्लाह की तरफ से हमेशा लानत बरसती रहती हैं।
हज़रत सय्यदना सुफियान सौरी रहमतुल्लाह अलैहि फरमाते हैं जो हराम माल से सदका खैरात करता हैं वो ऐसे शख्स के बराबर हैं जो नापाक कपड़ो को पेशाब से धोता हैं।

हज़रत सहल बिन अब्दुल्लाह तुसतरी रहमतुल्लाह अलैहि फरमाते हैं की हलाल रिज़्क़ से बदन के सारे हिस्से इबादत में लगे रहते हैं दूसरी और हराम रिज़्क़ से गुनाहो में इज़ाफ़ा होता रहता हैं।

किसी बुज़ुर्ग ने फ़रमाया हैं की जब कोई शख्स हलाल रोटी का पहला निवाला खाता हैं तो उसके पहले के गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं जो इंसान हलाल रोज़ी की कमाई की तलाश में रहता हैं उसके गुनाह ऐसे झड़ते हैं जैसे पेड़ के पत्ते झड़ते हैं। हलाल कमाई की बरकतो के बारे में आप हमारी आगे की पोस्ट हलाल कमाई की बरकत को पढ़ सकते हैं

लिहाज़ा हम सभी को अल्लाह से यही दुआ करनी चाहिए की अल्लाह हमें ऐसे हराम कामो से दूर रहने की तौफीक अता फरमाए जो सीधे जहन्नम की और ले जाते हैं और अपने दीन पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए आमीन ।

ग़ुस्ल करने का तरीक़ा (Gusl Ka Tarika in Hindi)

इस्लाम पाक व साफ़ मज़हब हैं। वह पाकीज़गी को पसंद करता हैं। जहाँ क़ुरान व हदीस में रूह को पाक व साफ़ करने रखने के तरीके बताये गए हैं, वही बदन ...

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