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अज़ान की अहमियत और फ़ज़ीलत (Importance and Superiority of Azan)

अज़ान की अहमियत और फ़ज़ीलत (Importance and Superiority of Azan)

अज़ान का मतलब हैं खबर देना या एलान करना इस्लामी शरीयत की ज़बान में अज़ान उन अल्फाज़ो को कहा जाता हैं जिनसे लोगो को खबर दी जाती हैं की नमाज़ का वक़्त हो चुका हैं मस्जिद में आये और जमाअत से नमाज़ अदा करे। फ़र्ज़ नमाज़ो को अदा करने के लिए अज़ान देना सुन्नत हैं। जिस बस्ती से अज़ान की आवाज़ आये तो मालूम चल जाता हैं की यहाँ के रहने वालो में मुस्लमान भी हैं यही वजह है की सरकार या सहाबा जब जिहाद के लिए मदीना से बाहर तशरीफ़ ले जाते तो जिस बस्ती से अज़ान की आवाज़ सुनते तो अन्दाज़ा लगा लिया करते की यहाँ मुसलमान रहते हैं।

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर का बयान हैं की जब हम मक्का से हिजरत करके मदीना आये तो लोगो को नमाज़ के लिए जमा करने की तरकीब के बारे में सोच विचार करने लगे, लोगो ने अपनी अलग अलग राय पेश की कुछ सहाबा ने रात को ख्वाब में फ़रिश्तो की ज़बानी कुछ ऐसे अल्फ़ाज़ सुने जिन्हे जब उन्होंने अल्लाह के रसूल से बयान किया तो आका बहुत खुश हुए और हज़रत बिलाल को बुलाकर फ़रमाया ! अब नमाज़ के वक़्त तुम यही अल्फ़ाज़ बुलंद आवाज़ से अदा किया करो चुनांचे वही अल्फ़ाज़ क़यामत तक के लिए अज़ान बन गए जो पूरी दुनिया में अदा किये जाते हैं।

हज़रत मुआविया रदियल्लाहो अन्हो का बयान हैं की मैंने अल्लाह के रसूल पैगंबर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को फरमाते हुए सुना हैं की क़यामत के दिन अज़ान देने वालो की गर्दने सबसे ऊँची होगी इस बात से पता चल जायेगा की यह लोग दुनिया में अज़ान पढ़ा करते थे। अल्लाह की तरफ से अज़ान पढ़ने वालो के लिए बहुत बड़ा ऐजाज़ होगा।

इसी तरह एक और हदीस में आया हैं की मुअज़्ज़िन (अज़ान देने वाला) की आवाज़ जहाँ तक पहुँचती हैं वहां तक की सारी चीज़े जैसे इंसान, जिन्न और दूसरी मखलूक सभी क़यामत के दिन उसके ईमान की गवाही देंगे।
अज़ान की आवाज़ सुनते ही खामोश हो जाये और अज़ान के कलेमात का जवाब दे अज़ान का जवाब देना वाजिब हैं अगर कई कई मस्जिदों से अज़ान की आवाज़ सुनाई दे तो सिर्फ एक ही अज़ान का जवाब देना काफी हैं। खुलूसे दिल से अज़ान का जवाब देने वालो को अल्लाह के रसूल ने जन्नत की बशारत दी हैं।

       लिहाज़ा जब भी अज़ान हो हम सभी को कुछ देर के लिए अज़ान सुनने और उसका जवाब देने के लिए तैयार रहना चाहिए और नमाज़ की पाबन्दी करनी चाहिए।

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