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हज यात्रा से जुड़ी कुछ ज़रूरी बातें (Some Important things Related to Hajj Pilgrimage)

हज यात्रा से जुड़ी कुछ ज़रूरी बातें ((Some Important things Related to Hajj Pilgrimage)

पिछली पोस्ट में हमने हज की फ़ज़ीलत के बारे में बात करी थी,आज हम हज यात्रा से जुड़ी कुछ ज़रूरी बातो पर बात करेंगे। हज सन 9 हिजरी में फ़र्ज़ हुआ यह भी इस्लाम का एक रुक्न हैं इसके फ़र्ज़ होने का इंकार करने वाला काफिर हैं। हैसियत वालो पर ज़िन्दगी में एक बार हज करना फर्ज हैं दिखावे के लिए हज करना या हराम कमाई की कमाई से हज करना हराम हैं। हज फ़र्ज़ होने पर उसी साल हज के लिए जाना फ़र्ज़ हैं और देर करना गुनाह हैं हज फ़र्ज़ हो गया लेकिन हज नहीं किया गया यहाँ तक की माल खत्म हो गया तो ऐसी हालत में क़र्ज़ लेकर हज के लिए जाना ज़रूरी हैं।
हज वाजिब होने की कुछ शर्ते हैं जैसे,
1.मुसलमान होना 2.बालिग होना 3.आकिल होना (मजनू,पागल पर हज फ़र्ज़ नहीं) 4.आज़ाद होना(गुलाम पर हज फ़र्ज़ नहीं) 5.तंदरुस्त होना(अपाहिज और अंधे वगैरह पर हज फ़र्ज़ नहीं और इन्हे अपनी तरफ से हज पर भेजना भी वाजिब नहीं 6.सफर खर्च का मालिक होना 7.औरत के लिए महरम होना
जिसके अंदर यह सारी बातें पायी जाये उसे हज के लिए जाना ज़रूरी हैं वह जितनी देरी करेगा उतना गुनहगार होगा और अगर बिना हज किये चल बसा तो उसका ईमान खतरे में हैं।
हज में तीन फ़र्ज़ हैं
1.एहराम
2.वकूफ़े अरफ़ा (ज़िल हिज्जा की 9 तारीख को सूरज ढलने से 10 वी की सुब्हे सादिक से पहले तक किसी वक़्त अरफ़ात  में ठहरना।
3.तवाफ़े ज़ियारत इससे पता चला की बगैर एहराम बांधे हज नहीं हो सकता अगर कोई आदमी 9 तारीख को मैदाने अरफ़ात में न पहुँच सके तो उसका हज नहीं होगा और जो आदमी तवाफ़े ज़ियारत न कर पाए तो उसका हज नहीं होगा।

हज पर जाने वालो को चाहिए की सफर पर रवाना होने से पहले हज के मसायल की जानकारी हासिल कर ले ताकि कोई ऐसी गलती न हो पाए जिससे की सारी मेहनत व पैसा बेकार हो जाये अफ़सोस है की आज कल इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाता आजकल पैसा खूब हो गया हैं तो लोगो को हज करने का शौक लग गया हैं मगर अफ़सोस की हज के अरकान की अदाएगी के बारे में मसायल सिखने की फ़िक्र कम ही लोगो को होती हैं यहाँ तक की अक्सर हाजियो को तलबिया (लब्बैक) भी याद नहीं होता अल्लाह उन्हें तौफीक दे।

फ़र्ज़ अरकान अदा करने में कोताही होने पर हज नहीं होता लेकिन हज के वाजिबात में से अगर कोई वाजिब किसी वजह से छूट जाए तो जानवर ज़िबह करना वाजिब हो जाता हैं जानवर ज़िबह करने से कमी पूरी हो जाती हैं जैसे की नमाज़ में वाजिब छूटने पर सज्दए सहव करने से नमाज़ सही हो जाती हैं।

हज के वाजिबात कुछ इस तरह हैं
1.मीक़ात या उससे पहले एहराम बांधना (यहाँ मीक़ात का मतलब एक तरह की सीमा हैं जहाँ हज यात्रियों को एहराम बांधना होता हैं)
2.सफ़ा-मर्वा के बीच सई करना (काबा से कुछ दूरी पर स्थित सफा और मर्वा की पहाड़ियों के बीच सात बार चलने की भक्ति क्रिया को सई कहा जाता है।
3.सफा पहाड़ी से शुरू करना
4.अगर कोई मज़बूरी न हो तो पैदल सई करना)
5.अरफ़ात से सूरज डूबने के बाद मुज़्दलेफा के लिए निकलना
6.मुज़्दलेफा में ठहरना (यह एक तरह का खुला स्थान हैं जहाँ हज यात्री ठहरते हैं यह हज की एक प्रक्रिया में शामिल हैं)
7.मगरिब व ईशा की नमाज़ मुज़्दलेफा में पढ़ना
8.शैतान को कंकरी मारना
9.दस तारीख को कंकरी मार कर बाल कटवाना
10.हुदूदे हरम में ही क़ुरबानी करना
11.हतीम के बहार से तवाफ़ करना
12.बावज़ू तवाफ़ करना
13.तवाफ़ के बाद 2 रकत नमाज़ पढ़ना (अगर तवाफ़ के बाद नमाज़ नहीं पढ़ी जाती तो दम (जानवर की क़ुरबानी) वाजिब नहीं लेकिन गुनहगार होगा
14.पहले शैतान को कंकरी मारना फिर सर के बाल उतरवाना अगर इसमें कोई काम आगे पीछे हो गया तो दम (जानवर ज़िबह करना पड़ेगा)
15.विदाई तवाफ़ करना भी वाजिब हैं मक्का शरीफ से रवानगी के वक़्त अगर औरत नापाक हो तो उसके लिए माफ़ हैं इसके अलावा भी ज़रूरी मसायल हैं जिन्हे मालूम करना बहुत ज़रूरी हैं।

मीक़ात से बाहर से आने वाले मक्का शरीफ पहुँच कर जो पहला तवाफ़ करते हैं उसे तवाफ़े कुदूम कहा जाता हैं।

तवाफ़ के शुरू के पहले तीन फेरो में एहराम की चादर दाहिने कंधे के नीचे से निकाल कर बाएं कंधे पर डाली जाती हैं दाहिना कन्धा खुला रखा जाता हैं और तीन फेरो में रमल (एक प्रकार की प्रथा) किया जाता हैं कुछ लोग सातों फेरो में कन्धा खुला रखना ज़रूरी समझते हैं यह बात सही नहीं इसी तरह एहराम की हालत में नमाज़ पढ़ने के दौरान एहराम की चादर से दोनों कंधो को ढका रखना चाहिए सई के दौरान भी दोनों कंधे ढके रहने चाहिए।

उमरा का एहराम बांधने के बाद एहराम की हालत में सबसे बेहतरीन वज़ीफ़ा तलबिया हैं इसका सिलसिला तवाफ़ करने से पहले तक जारी रखना चाहिए और हज के दौरान लब्बैक का सिलसिला 10 तारीख को बड़े शैतान को कंकरी मारने से पहले तक जारी रखना चाहिए।

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