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अशुरा (मुहर्रम) की गलत रस्में (Incorrect rituals of Ashura (Muharram)

अशुरा (मुहर्रम) की गलत रस्में (Incorrect rituals of Asura (Muharram)

मोहर्रम के मौके पर बहुत सारी गलत रस्मो या कामो को किया जाता हैं इन रस्मो का इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं है, लेकिन मुसलमान आज उन्हें अपना ईमान समझने लगे हैं उनका यह मानना हैं की आशूरा के दिन यही चीज़े की जानी चाहिए यह बहुत बड़ी गुमराही है हजारों रुपए का रोज़ा बनाकर पानी में ठंडा कर देना,मिट्टी में दफन कर देना या जंगल में फेंक देना कौन सी अकलमंदी या इस्लामी शान हैI इसी तरह से तो कौम का बहुत बड़ा सरमाया (संपत्ति) बर्बाद हो जाता है जो कि हराम है

इसके अलावा ढोल ताशे बजाना,मातम करते हुए गली गली फिरना,हाथो और सीने को जंजीरों,औज़ारो से जख्मी करना, ताजिये के नीचे अपने बच्चे को लेटाना, ताजिए को सजदा करना उसके नीचे की धूल अपने चेहरे पर मलना, बच्चों को मोहर्रम का फकीर बनाना, मोहर्रम की फातिहा के लिए भीख मंगवाना,तैयार होकर नए कपड़े पहनकर सज धज कर सीना खोले हुए गली-गली घूमना,ताजिया का जुलूस देखने के लिए औरतों,लड़कियों का बेपर्दा होकर सज-धज कर बाज़ार में घूमना,ताजियों को इमाम हुसैन का रोज़ा मानना उसे झुक झुक कर सलाम करना,ताजिये को हज़रत इमाम हुसैन का रोज़ा समझकर फातेहा लगाना,फूल माला चढ़ाना इसके अलावा और दूसरी गैर इस्लामी रस्मे हमारे लिए जायज़ नहीं

हर मुसलमान को इन हरकतों से बचना चाहिए यह सब काम करना गुनाहे कबीरा हैं। लेकिन नहीं यह तो सालों से चला आ रहा हैं इसे करना तो वह अपना फ़र्ज़ मानते हैं इन सब कामो को करने की बजाये हमें उस दिन नमाज़,रोज़ा और क़ुरान की तिलवात करनी चाहिए भूखे प्यासे लोगो के लिए खाने पीने का इंतेज़ाम करना चाहिए 

ताजियादारी या मोहर्रम की रस्में हिंदुस्तानी मुसलमानों का एक त्यौहार सा बन गया है इनका इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं है हमें त्यौहार मनाना, खुशी मनाना जायज़ है लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि हमारी इस हरकत या अमल से इस्लामी अक़ीदे को नुकसान तो नहीं पहुंच रहा है 

अल्लाह हमें हज़रत इमाम हुसैन की शहादत के असली पैगाम पर अमल करने की तौफीक अता फरमाए आमीन  

मुहर्रम की अहमियत (Importance of Muharram)

मुहर्रम की अहमियत (Importance of Muharram)

रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, जिसने मोहर्रम में किसी एक दिन भी रोज़ा रखा तो उसे एक रोजे के बदले 30 रोज़ो का सवाब दिया जाएगा  जिसने आशूरा (मोहर्रम) की दसवीं तारीख को रोज़ा रखा उसे 10000 फ़रिश्तो, 10000 शहीदों और 10000 हज उमरा करने वालों का सवाब दिया जाएगा  जिसने अशुरा को किसी यतीम के सर पर हाथ फेरा तो अल्लाह यतीम के सर के हर बाल के बदले जन्नत में उसका दर्जा बुलंद फरमाएंगा  जिसने आशूरा के दिन किसी मोमिन को रोज़ा खुलवाया गोया उसने अपनी तरफ से सारी उम्मते मोहम्मदी को रोज़ा खुलवाया

जिसने आशूरा का रोज़ा रखा है उसके लिए 60 साल की इबादत का सवाब अल्लाह तआला लिख देता है  सातों आसमानों के फ़रिश्तो का सवाब लिख देता हैI  हज़रत उमर फारुक ए आजम ने रसूले अकरम से अर्ज़ किया या रसूललल्लाह आशूरा का रोज़ा देकर खुदा ने हमारी बड़ी इज्जत बढ़ा दी हैं  सरकार ने फरमाया बेशक क्योंकि इसी दिन अल्लाह ने अर्श, कुर्सी  सितारों,पहाड़ों,जिब्राइल और दुसरो को भी पैदा फरमाया   
हज़रत इब्राहिम को आशूरा के दिन ही नमरूद की आग से निजात बक्शी 
फ़िरऔन आशूरा को ही नील नदी में डुबाया गया 
हज़रत इदरीस को इस दिन आसमान पर उठाया 
हज़रत ईसा अलेहिस्सलाम की पैदाइश आशूरा के ही दिन हुई हज़रत आदम की तौबा इसी दिन कबूल की  
हज़रत सुलेमान को बादशाहत आशूरा के दिन ही बख्शी गई और कयामत भी आशूरा के दिन आएगी 
आसमान से सबसे पहली बारिश आशूरा के दिन ही हुई 

आशूरा के दिन ग़ुस्ल करने वाला खतरनाक बीमारियों से महफूज रहेगा इस दिन जो आदमी आंखों में पत्थर का सुरमा लगाएगा साल भर तक उसकी आंखें (एक तरह की बीमारी) नहीं आएगी I जिसने आशूरा के दिन चार रकात नमाज इस तरह पढ़ी कि हर रकात में एक बार अल्हम्दो और 50 बार कुलहुवल्लाह पढ़ी, अल्लाह तआला उसके 50 साल के अगले पिछले गुनाह माफ फरमा देगा  उसके लिए नूर के हजारों महल तैयार कराएगा, नमाज के बाद 70 बार दुरूद शरीफ भी पढ़ना चाहिए

आशूरा के दिन अपने घर वालों को अच्छे से अच्छा खाना खिलाओ जो ऐसा करेगा खुदा उसकी रोज़ी में साल भर तक खूब बरकत अता फरमाएगा  आशूरा का रोजा रखने वालों को मौत के वक्त कोई परेशानी नहीं होगी  बनी इसराइल पर साल में यही आशूरा का रोजा फ़र्ज़ था  पैग़ंबरे इस्लाम भी आशूरा के दिन रोज़ा रखते थे जब आप मदीना तशरीफ़ लाये तो यहूदियों को भी यह रोज़ा रखते देखा जब रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ हुए तो कुछ लोगों ने रोज़ा रखा कुछ ने छोड़ दिया I आपने यहुदीओ से पूछा आशूरा का रोज़ा क्यों रखते हो? जवाब दिया कि इस तारीख को अल्लाह ने फ़िरऔन को दरिया में गर्क करके हमारे नबी हज़रत मूसा को निजात बख्शा यह सुनकर आपने फरमाया हमारा ताल्लुक हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से तुमसे ज़्यादा है यह कह कर आप ने मुसलमानों को दो दिन (9-10 मोहर्रम) को रोज़ा रखने का हुक्म दिया 

आशूरा की फजीलत यह है कि इसी दिन हजरत इमाम हुसैन कर्बला में शहीद किए गए थे   
आज हिंदुस्तान में आशूरा इसी नाम और याद से जाना जाता है कि इसी दिन रसूले अकरम के भूखे प्यासे नवासे और उनके खानदान वाले कर्बला में शहीद किए गए थे I उनकी शहादत की याद में आशूरा मनाया जाता हैं 

आशूरा के दिन कुछ चीजें मुस्तहब है, 
रोजा रखना 
सदक़ा करना 
नफ़्ल नमाज़ पढ़ना
1000 बार कुलहु वल्लाह शरीफ पढ़ना 
आलिमो की ज़ियारत करना 
यतीम के सर पर हाथ फेरना
घर वालों को खूब अच्छा खिलाना पिलाना
भूके प्यासे लोगो के लिए खाना पानी का इंतेज़ाम करना

अल्लाह हमें इन सब बातों पर अमल करने की तौफीक अत फरमाए आमीन   

माँ बाप की नाफरमानी का अंजाम

माँ बाप की नाफरमानी का अंजाम


इस ज़माने में लड़के लड़कियां मां बाप के हुकूक से बिल्कुल गाफिल(बेपरवाह) है I उनकी ताज़ीम अदब खिदमत और फरमाबरदारी से मुंह मोड़े हुए हैं बल्कि कुछ तो इतने बदनसीब हो गए हैं कि मां बाप को बुरी तरह तकलीफ पहुंचा रहे हैं नतीजा यह है कि मां बाप की नाफरमानी करके खुदा के अज़ाब का शिकार और जहन्नम के हकदार बन रहे हैं I

एक आदमी ने पूछा, या रसूल अल्लाह माँ बाप का औलाद पर क्या हक़ हैं? (औलाद को मां बाप के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए) आपने फरमाया वह दोनों तुम्हारी जन्नत और दोज़ख है उन्हें खुश रखने में जन्नत और नाराज़ रखने में जहन्नम मिलेगी I

क्या कहती है इस्लामिक हदीस? 

बहेकी शरीफ की हदीस हैं, जिस आदमी से उसके मां-बाप खुश होते हैं उनके लिए सुबह से ही जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं एक आदमी ने पूछा या रसूल अल्लाह अगर मां-बाप ज़्यादती करें तो? आपने फरमाया अगरचे ज़ुल्म करें तब भी मां बाप को राज़ी रखना जरूरी है क्योंकि उन्होंने ही तुम्हें इस दुनिया में लाया है पाल पोस कर बड़ा किया है I दारमी शरीफ की हदीस है किसी के साथ भलाई करके अहसान जताने वाले, मां-बाप की बात ना मानने वाले और हमेशा शराब पीने वाले जन्नत में नहीं जा सकते I

हजरत आबू हुरैरा फरमाते हैं कि रसूल अल्लाह ने फरमाया जो अपने मां बाप को सताए वो शख्स मलऊन हैहजरत अब्दुल्लाह बिन औफ़ा फरमाते हैं, एक आदमी आया कहने लगा या रसूल अल्लाह एक जवान मरने के करीब है उसे कलमा पढ़ने की ताकीद दी जाती है, लेकिन उसकी जबान नहीं चल रही है I आपने पूछा क्या वह पहले कलमा पड़ता था, आदमी बोला हाँ पढ़ता था, आपने फरमाया जब जिंदगी में पढ़ता था तो मौत के बाद कौन रोक रहा है? इतना कहते ही आप उसके घर की तरफ चल पड़े सहाबा भी साथ हो लिए वहां पहुंचकर आपने मरने वाले जवान से फरमाया पढ़ो "ला इलाहा इलल्लाह" जवान बोला सरकार ज़बान नहीं चल रही, आपने पूछा तुम्हारी मां है,वह बोला हाँ है, इतने में उसकी मां अंदर से आई आपने फरमाया ! क्या तुम यह पसंद करोगी कि तुम्हारे लड़के को जलती हुई आग में डाल दिया जाए I माँ बोली नहीं मुझे यह गवारा नहीं कि मेरा बेटा आग में जलाया जाएI आपने फ़रमाया तेरा बेटा ना फरमान तु इससे नाराज़ है तेरी नाराज़गी की वजह से इसे मौत के वक्त कलमा पढ़ने की तौफीक नहीं मिल रही है,अगर तूने इसे माफ नहीं किया तो यह यूं ही मर जायेगा और इसे जहन्नम की आग में जलाया जाएगा क्या तुझे मंजूर है? मां की ममता को जोश आया वह बोली, मैंने इसकी ख़ताये माफ की इतना कहना था कि लड़का कलमा शरीफ पढ़ने लग गया I

मुसलमानों! इस हदीस से पता चलता है कि अगर हमारे माँ बाप हमसे नाराज है तो हमारी सारी इबादत बेकार होगी और मरते वक्त कलमा पढ़ने की तौफीक भी नहीं मिलेगी I

एक वाकया (किस्सा) और सुनिए ताकि अच्छी तरह मालूम हो जाए कि मां-बाप की नाफरमानी करके कितना बड़ा गुनाह और अज़ाब मोल ले रहे हो I अस्बहानी कहते हैं कि मैं एक जगह मेहमान था, मेहमान के घर पास ही कब्रस्तान था अस्त्र के बाद मैंने देखा कि एक कब्र फटी उसमें से एक आदमी निकला जिसका सर तो गधे का और बदन आदमी जैसा था, वह तीन बार गधे की तरह जोर जोर से चिल्लाया और वापिस कब्र के अंदर चला गयाI मैंने लोगों से उसके बारे में पूछा तो बताया कि वह एक शराबी था, उसकी माँ उसे मना करती उसे डांटती लेकिन वह मानता ही नहीं था बल्कि उल्टा उसको बुरा भला कह देता एक दिन उसकी माँ जब उसे मना करने लगी तो उसने उसकी माँ को कहा खामोश रहो क्या गधे की तरह चिल्लाती हो, मां बेचारी खामोश हो गई खैर एक दिन वह अस्र के वक्त मर गया और दफना दिया गया उसी दिन से हर रोज अस्र के वक़्त यह कब्र फटती है और वह निकलता है और गधे की तरह चिल्ला कर चला जाता है, यह नतीजा हैं उसके उस जवाब का जो उसने उसकी मां को दिया था I

भाइयों तो पता चला की माँ बाप की नाफरमानी और शराब पीने वालों को बुरी तरह अंजाम दिया जायेगा जो लोग किसी वजह से अपने माँ बाप को तकलीफ पहुंचा रहे हैं उन्हें सोचना चाहिए कि उनका क्या होगा और माँ बाप अगर नाराज़ हैं तो उन्हें कोई नहीं बचा सकता I माँ बाप अगर नाराज़ हैं तो अल्लाह रसूल भी नाराज़ और जिससे अल्लाह रसूल नाराज़ उसको तबाही और अज़ाब से कोई नहीं बचा सकता I

आजकल देखा जाता हैं की कुछ लोग अपने माँ बाप को छोड़कर अलग से आलिशान घर बना लेते हैं, और अपनी बीवी बच्चो के साथ रहते हैं ताकि उनके ऊपर कोई ज़िम्मेदारी न आये जैसे माँ बाप के आख़री वक़्त में लगने वाले इलाज के पैसे उनकी दवाइयों का खर्चा, तरह तरह की बीमारियों के इलाज के पैसे वगैरह वह खुद लाखो रूपए कमाते है लेकिन माँ बाप को कुछ हज़ार रूपए देने में झिझकते हैं और बहाना बनाते हैंI बीवी बच्चो के लिए तरह तरह की चीज़े ले आते हैं लेकिन माँ बाप के लिए लाने सोचते हैं ऐसे लोगो का आख़िरत में क्या हाल होगा अगर उन्हें बता दिया जाये तो उनकी रूहे डर से काँप उठे I उन्हें पहले यह सोचना चाहिए की हम आज इस मुकाम पर कैसे पहुंचे हैं इसके पीछे किसका हाथ हैं जिस माँ ने कितना दर्द सह कर उन्हें पैदा किया और बड़ा किया जिस बाप ने कैसे खून पसीने की कमाई से उनकी पढाई लिखाई की और कामयाबी के मुकाम तक पहुँचाया I

बहरहाल सब दुआ करो की खुदा हमें माँ बाप की फरमाबरदारी और उनकी खिदमत की तौफीक बक्शे और हमे जहन्नम के अज़ाब से बचाये I
आमीन 

यासीन शरीफ की फ़ज़ीलत (Superiority of Yaseen Sharif)

यासीन शरीफ की फ़ज़ीलत (Superiority of Yaseen Sharif)

हदीस शरीफ में है हर चीज़ का दिल होता है और कुरान का दिल यासीन शरीफ है I जो शख्स एक बार सूरह यासीन पड़ेगा उसे अल्लाह ताला 10 कुरान शरीफ खत्म करने का सवाब अता फरमाएगा I रसूले खुदा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम ने फरमाया मरने वाले के पास यासीन शरीफ पढ़ो इसकी बरकत से मरने वाले की रूह आसानी से कब्ज़ की जाती हैI इंतकाल के बाद इसे पढ़कर इसाले सवाब करोगे तो उसके गुनाह बख्श दिए जाएंगे, कब्र पर पढ़ोगे तो बख्श दिया जाएगा I

रेहमते आलम ने फरमाया जो आदमी रात को यासीन शरीफ पढ़ कर सोता है तो सुबह को वह बख्श दिया जाता हैI मुस्तफा जाने रहमत ने फरमाया यासीन शरीफ पढ़ते रहो इसमें 10 बरकते हैं-
भूखा पढ़ेगा तो खुशहाल हो जाएगा
प्यासा पढ़ेगा तो सैराब हो जाएगा
नंगा (फ़क़ीर) पढ़ेगा तो उसे कपड़े मिल जाएंगे
बगैर बीवी वाला पढ़ेगा तो निकाह हो जाएगा
डरा सहमा इंसान पड़ेगा तो खौफ दूर हो जाएगा
कैदी पढ़ेगा तो आज़ाद हो जाएगा
मुसाफिर पढ़ेगा सफर में आसानी होगी
कर्ज़दार पढ़ेगा तो क़र्ज़ अदा हो जाएगा
कोई चीज गुम हो जाए तो पढ़ने पर चीज़ मिल जाएगी
मरने वाले के पास पढ़ने से रूह आसानी से कब्ज़ की जाएगी

यासीन शरीफ पढ़ कर किसी पर दम करने से शैतानी साया या हवा दूर हो जाती हैं I जो आदमी जुम्मा के दिन सूरह यासीन पढ़ेगा खुदा उसकी मुंह मांगी मुराद पूरी फरमाएगा Iजो पाबंदी से रात को सोते वक्त यासीन शरीफ पढ़ता है और उसी हालत में मर जाता है तो अल्लाह की तरफ से उसे शहीद का दर्जा अता किया जाता है I जो आदमी हर जुम्मा को अपने मां-बाप की कब्र पर जाकर यासीन शरीफ पढ़ता है तो उनकी बख्शीश हो जाती है I जो आदमी रोजी में बरकत तरक्की के लिए पढ़ता है तो उसकी रोजी में बरकत हो जाती है I जो मुसीबत के वक्त पढ़ेगा तो उसकी परेशानियां दूर हो जाएगी जो किसी को पढ़कर सुनाएगा उसे 20 हज का सवाब मिलेगा जो सुनेगा उसे 10 दीनार खैरात करने का सवाब मिलेगा I बीमार पढ़ेगा तो तंदुरुस्ती मिलेगी और बेऔलाद पढ़ेगा तो उसे नेक औलाद मिल जाएगी I
अल्लाह हमें दीने इस्लाम पर चलने की तौफीक अत फरमाए आमीन I

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम की बरकत (Prosperity of Bismillah Hir-Rahman Nir-Rahim)

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम की बरकत (Prosperity of Bismillah Hir-Rahman Nir-Rahim)
क़ुरान शरीफ की हर आयत में शिफा व रहमत हैं, मोमिनो को चाहिए की इस से फैज़ हासिल करे। बहरहाल बिस्मिल्लाह शरीफ पढ़ने,किसी पर दम करने के क्या फायदे हैं उसके बारे में बात करते हैं।

1.जब कोई परेशानी या मुश्किल का सामना हो तो बिस्मिल्लाह शरीफ को वज़ू कर के 786 मर्तबा सात दिन तक लगातार पढ़े अल्लाह ने चाहा तो जल्द ही परेशानी दूर हो जाएगी।

2.बिस्मिल्लाह शरीफ किसी कागज़ पर 101 बार लिख कर खेत दुकान या कारखाने में इत्र लगा कर अदब की जगह रख कर दफ़न कर देने से खेत हरा भरा पैदावार ज़्यादा और दुकान व कारखाने में बरकत होगी।

3.अगर किसी के सर में दर्द रहता हो और इलाज से भी कोई फ़ायदा न होता हो तो किसी भी दिन सूरज निकलने से पहले फज़र की नमाज़ के बाद अर्क गुलाब पर बिमिलल्लाह शरीफ 330 मर्तबा पढ़कर दम कर के 3 दिन तक लगातार ऐसा करने से दर्द जाता रहेगा।(इंशा अल्लाह)

4.अगर किसी पर जादू कर दिया गया हो तो 7 दिन तक रोज़ाना असर की नमाज़ के बाद 100 मर्तबा बिस्मिल्लाह पढ़ कर दम किया जाये इंशा अल्लाह जादू का असर ख़त्म हो जायेगा।

5.अगर किसी पर जिन्नात का असर हो तो सफ़ेद कागज़ पर गुलाब व ज़ाफ़रान से 35 मर्तबा बिस्मिल्लाह लिख कर काले रंग के कपड़े में लपेट कर हाथ में लटका दिया जाये तो इसकी बरकत से इंशाअल्लाह जिन्नात भाग जायेंगे।

6.अगर कोई किसी पर आशिक हो गया और उस इश्क़ से घर वालो की इज़्ज़त दांव पर लगी हो अगर घर वाले उसके इश्क़ को ख़त्म करना चाहते हो तो एक मिट्टी के लोटे(बर्तन) में पानी भर कर उस पर 900 बार बिस्मिल्लाह शरीफ पढ़कर फूँक दे और आशिक़ को यह पानी 21 दिन तक लगातार पीला दे तो इंशाल्लाह शिकायत खत्म हो जाएगी रोज़ाना एक बार पिलाना काफी हैं।

7.अगर कोई मिर्गी का मरीज़ हो तो उसके दाएं कान में 40 मर्तबा और बाएं कान में 20 मर्तबा बिस्मिलाह शरीफ पढ़ कर दम करे इंशाल्लाह मिर्गी से छुटकारा मिल जायेगा।

8.मियां बीवी के नामों के साथ वालिदा के नाम के अदद की तादाद के मुताबिक बिस्मिल्लाह पढ़कर पानी पर दम करके मियां बीवी दोनों को पिलाये तो दोनों में गहरी मुहब्बत हो जाएगी।

इस्लाम में शादी व निकाह और आजकल के हालात (Marriage in Islam)

इस्लाम में शादी व निकाह और आजकल के हालात (Marriage in Islam)

अल्लाह पाक ने मर्द में औरत की तरफ और औरत में मर्द की तरफ दिलचस्पी और ख्वाहिश पैदा की है और दोनों में एक दूसरे की चाहत और जरूरत रखी है। दोनों की जिंदगी एक दूसरे के बिना अधूरी रहती है। इस चाहत को नफ़्सानी ख्वाहिश कहा जाता है। जिसे पूरा करना इंसानी फितरत का तकाज़ा है। यह ख्वाहिश पूरी ना हो तो इंसान की जिंदगी अधूरी सी लगती हैं, इसके बिना इंसान खुश तो रहता हैं मगर अंदर ही अंदर एक  मायूसी सी महसूस करता हैं।

इस ख्वाहिश को पूरा करने के लिए इंसान को जानवरों की तरह बिल्कुल आजाद नहीं छोड़ा गया है। इंसान चूँकि अल्लाह की मखलूक में सबसे अशरफ, इज्जतदार और काबिले एहतराम मखलूक है, इसलिए अल्लाह पाक ने इंसान को उसकी यह ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक बाइज़्ज़त रास्ता बताया है, जो तकरीबन सभी धर्मों में आज आम है, उसे इंसान की जरूरत समझते हुए एहतराम की नजरों से देखा जा सकता है।

इस्लाम में इस मिलाप के लिए जो रहनुमाई की है उसे निकाह कहा जाता है। निकाह का मकसद यह है कि शरीयत के दायरे में रहकर इस बंधन में बंध जाने के बाद मियां बीवी अपनी ख्वाहिश पूरी करें,जो वह एक दूसरे से चाहते हैं। निकाह से पहले जो एक दूसरे के लिए हराम थे, निकाह से अब हलाल हो गए उन्हें एक दूसरे के साथ रहने का दीनी व कौमी हक हासिल हो गया।
उन दोनों पर एक दूसरे की खिदमत वगैरह, जरूरतें पूरी करने की जिम्मेदारी आ गई यह सारे अख़तियारत निकाह के 2 लफ्ज़ो में शामिल होते हैं।

चंद लोगों की मौजूदगी में दो गवाहों के सामने एक ने कहा- मैंने तुमसे निकाह किया और दूसरे ने कहा मैंने कबूल किया, बस निकाह हो गया। इस पाक रिश्ते में बंधने और बांधने के लिए इतना ही काफी है।

अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहू अलैही वसल्लम ने इसी सादगी के साथ मस्जिद-ए-नबवी में ना जाने कितने सहाबा को निकाह के मुबारक रिश्ते में जोड़ा। इसलिए कहा जाता है की निकाह मस्जिद में होना चाहिए। बात सिर्फ इतनी थी, लेकिन अफसोस आज दुनिया ने इसे कहां से कहां पहुंचा दिया है।

अब तो सालों पहले से इसकी तैयारी होने लगती है। दोनों तरफ से खूब- खूब खर्चे करा कर उन्हें तबाह करने की स्कीमे बनाई जाती है। अब तो हाल यह है कि घर में लड़की पैदा हुई और पता हैं की उसका निकाह 18 से 20 साल बाद होगा लेकिन पैदा होते ही घर वाले उसे एक बोझ समझने लग जाते हैं। उसके लिए फ़िक्रमंद हो जाते हैं, बैंकों में उसके नाम से बचत खाता खोल लिए जाते हैं। उस बच्ची का बीमा का भी करा देते हैं। उसके नाम से तरह-तरह की बचत स्कीमों को तलाशने में लग जाते हैं ताकि उसकी शादी धूमधाम से हो सके यह सब क्यों हुआ? हकीकत तो यह है कि इंसान ने अपनी कब्र खुद ही खोद ली है। अल्लाह की बख़्शी नेमतों लज़्ज़तो को खुद ही अपने लिए मुसीबत व अज़ाब बना डाला हैं।

सुख के बदले दुख, राहत, चैन सुकून के बदले बेचैनी व परेशानी मोल ले ली है, हालांकि इस्लामी नज़रिये से अगर किसी के कई लड़कियां हो तो भी उसे फिक्रमंद होने की जरूरत नहीं लेकिन आजकल तो एक या दो बेटियां भी लोगो पर बोझ बन गई है।
 इस्लामी शरीयत में निकाह के मामले में लड़की-लड़के वालों पर कोई बोझ नहीं है। किसी पर कुछ खर्चा वाजिब नहीं किया गया हैं कि इतना और यह तो करना ही पड़ेगा।

किसी को  नाश्ता पानी और खाना खिलाने पर भी मजबूर नहीं किया गया है। हां, वलीमे की दावत को सुन्नत करार दिया गया है, लेकिन अफसोस आज हमारी कौम ने इस्लामी क़द्रो व रिवाजो को एक तरफ रख दिया है, और मांगने और खाने पर उतर आए हैं। रिश्ता तय हुआ की लड़के वालों ने लड़की वालो से कहा की हम बारात लेकर आएंगे बारातियो को यह-वह खिलाना होगा हमें यह-वह सामान देना होगा। ऐसे लोग अल्लाह की नज़र में सख्त गुनहगार हैं। जिसका अंजाम उन्हें आख़िरत में भुगतना होगा।

आजकल लोग एक नेक बंदा जो इज़्ज़त से नौकरी या धंधा करके हलाल कमाई करता हैं। उसकी आमदनी देखकर रिश्ता करते हैं। दूसरी तरफ अगर लड़का पढ़ा लिखा नहीं हैं और ऊपर से गुंडा मवाली हैं लेकिन पैसे वाला हैं, उसे ख़ुशी से अपनी लड़की सौंप देते हैं। भले ही शादी के बाद वह उसे मारे पिटे, सब मालूम होने के बावजूद कुछ लोग सिर्फ पैसा देखकर अपनी फूल से बेटी उसे सौंप देते हैं। यह हैं आजकल के कुछ मुस्लमान अल्लाह ऐसे लोगो को तौफीक दे। 

अपने आप को पढ़े लिखे, मालदार व इज़्ज़तदार समझने वाले निकाह के मामले में भिखारी बन गए हैं। तौबा तौबा! इस्लामी शरीयत ने तो लड़की वालों को कुछ भी खर्च करना जरूरी नहीं करार दिया है, बल्कि लड़के वालों को लड़की की मेहर अदा करने की ताकीद की है।

अल्लाह हमें इस्लामी शरीयत पर चलने की तौफीक अता फरमाए आमीन या रब्बुल आलमीन

हज़रत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती का इतिहास (ख्वाजा गरीब नवाज़) History of Hazrat Khwaja Moinuddin Chishti

हज़रत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती (ख्वाजा गरीब नवाज़) Hazrat Khwaja Moinuddin Chishti
हमारे ख्वाजा गरीब नवाज 14 रजब 536 हिजरी (1142 ईस्वी) को पीर (सोमवार) के दिन सिस्तान (ईरान देश का एक गांव) में पैदा हुए। कुछ विद्वान इनकी पैदाइश की तारीख और जन्म की जगह को अलग अलग बताते हैं। बहरहाल 9 साल की उम्र में आप हाफिज ए कुरान हो गए। ख्वाजा साहब की तालीम उनके घर पर ही हुई थी। विरासत में आपको एक छोटा सा बाग़ और एक पनचक्की मिली थी। हज़रत इब्राहिम कंदोजी से मुलाकात होने के बाद जब दिल की दुनिया बदली तो उसे बेच कर पैसा गरीबों में बांट दिया और खुद हक़ की तलाश में निकल पड़े।

आपने -अपने पीर हज़रत ख्वाजा उस्मान हारुनी रहमतुल्लाह अलैह कि 20 साल तक खिदमत की, इस दौरान आप हज़रत का बिस्तर, खाने के बर्तन, पानी की मशक और अपना सामान कंधे पर लाद कर घूमते फिरे।आपने 51 बार पैदल हज पर फ़रमाया और 52 साल की उम्र में 587 हिजरी (1192 ई.) में हिंदुस्तान तशरीफ़ लाएं।

अजमेर पहुंचकर आपको इस्लाम की तब्लीग़ शुरू करने से पहले किन किन हालात से दो-चार होना पड़ा उसे दोहराने की जरूरत नहीं। बहरहाल आपने अपनी रूहानी ताकत से शाही और शैतानी ताकतों का मुकाबला फरमा कर उन्हें ज़ेर फरमाया। आप हमेशा लोगो के लिए काफी फिकरमंद रहते थे।

आप गरीबों, दुखी लोगों के मसीहा बने, इंसानियत की खिदमत को अपना मिशन बनाकर इस्लाम की तब्लीग़ शुरू फ़रमाई।आपने अजमेर और आसपास के इलाको में इस्लाम,अमन और शांति का पैगाम घर घर पहुंचाया।

आपने एक ही कपड़े में जिंदगी बिताई। कपड़े फटने पर पैवन्द लगा लिया करते थे। पैवन्द लगाते लगाते उसका वजन साढ़े छह किलो हो गया था।
 6 रजब 633 हिजरी में आप अजमेर में पर्दा फरमा गए। इंतकाल के बाद आपकी पेेशानी पर नूरानी हरफों में लिखा हुआ था "हाजा हबीबुल्लाह माता फी कुतुबुल्लाह" मतलब की यह अल्लाह का दोस्त है जिसने अल्लाह की मोहब्बत में वफ़ात पायी। हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती रहमतुल्लाह अलैह की बरकत से हिंदुस्तान में इस्लाम का नूर फैला।

आपने कभी पेट भर खाना नहीं खाया कई कई दिनों तक भूखे रहने के बाद सूखी रोटी के टुकड़े पानी में भिगोकर खा लिया करते। आप 24 घंटे के अंदर पुरे कुरान शरीफ की तिलावत कर लिया करते थे। आपने  तकरीबन 70 साल तक लगातार पूरी रात आराम नहीं फरमाया।

आप 70 साल तक दिन रात के अक्सर औक़ात बावज़ू रहे, आप तो वली थे ही लेकिन आप जिस पर एक नजर डाल देते वह भी वली हो जाता। काफी दिनों तक आप इस्तिगराक(किसी चीज़ में डूब जाना) के आलम में रहे आंखें बंद किए ज़िक्रे इलाही में गुम रहते। नमाज के वक्त हुजरे से बाहर तशरीफ ला कर जमाअत से नमाज अदा फरमाया करते।

आज भी आपका आस्ताना दीन दुखियों और हक़परस्तो के लिए मर्कज़े अकीदत बना हुआ है, जहां रोजाना हजारों आते हैं और फ़ैज़ पाते हैं।आज भी अजमेर को आप के नाम से दुनिया में जाना जाता हैं। सालाना उर्स के दौरान दुनिया भर के लाखो लोग आपके दरबार में दुआएं/मुरादे मांगने आते हैं।

ग़ुस्ल करने का तरीक़ा (Gusl Ka Tarika in Hindi)

इस्लाम पाक व साफ़ मज़हब हैं। वह पाकीज़गी को पसंद करता हैं। जहाँ क़ुरान व हदीस में रूह को पाक व साफ़ करने रखने के तरीके बताये गए हैं, वही बदन ...

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