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रमज़ान और रोज़ा क्या हैं? (What is Ramzan and Roza)

रमज़ान और रोज़ा क्या हैं? (What is Ramzan and Roza)
रमज़ान और रोज़ा क्या हैं? (What is Ramzan and Roza)

इस्लामी कैलेंडर के नौवे महीने को रमज़ान का महीना कहा जाता हैं। यह महीना मुसलमानो के लिए एक पवित्र महीना माना जाता हैं। यह महीना इबादत का महीना कहलाता हैं। इस महीने में मुसलमान रोज़ा (उपवास) रखता हैं, खुदा की इबादत करता हैं, क़ुरान पढता हैं, ज़कात अदा करता हैं, और नमाज़ की पाबन्दी करता हैं। इस महीने में हर मुसलमान को हिदायत दी जाती हैं की वो वह पुरे रमज़ान में रोज़ा रखे, पाबन्दी से पांच वक़्त की नमाज़ अदा करे, गलत आदतों से दूर रहे और नेक काम करे। रोज़ा इस्लाम की पांच प्रमुख स्तम्भों में से एक स्तंम्भ हैं।

रोज़ा क्या हैं?

रोज़ा एक ऐसी इबादत है, जो मुसलमान मर्द औरत पर फ़र्ज़ है। अल्लाह के प्यारे रसूल फरमाते हैं जिसने अल्लाह के वास्ते सवाब की नियत से रमज़ान के रोज़े रखे उसके गुनाह बख्श दिए जाएंगे। इससे बड़ी और क्या बात हो सकती है कि बन्दे के गुनाह बक्श दिए जाए और उसे जन्नत की बशारत मिल जाए।
अगर किसी मजबूरी बीमारी की वजह से कोई रोज़ा न रख सके तो ईद के बाद इसकी कज़ा रखना भी फ़र्ज़ है।

फजर का वक्त होने से पहले और सूरज डूबने तक खाने पीने और हमबिस्तरी,गन्दी बुरी ज़बान, बुरी नज़र से बचे रहने को रोज़ा कहा जाता है। लेकिन यह सब अल्लाह की रज़ा और उसके हुक्म पर अमल करने की नियत से होना चाहिए ताकि मकसद पूरा हो सके।

अगर किसी ने रोज़ा रखने की नियत कर ली लेकिन दुआ नहीं पढ़ी तो भी उसका रोज़ा हो जाएगा। नियत के लिए अरबी दुआ व बिसोमि गदिन नवई तु मिन शहरि रमज़ान हाज़ा पढ़ ले तो अच्छा है अगर यह नहीं पढ़ा और अपनी ज़बान से यह कह लिया कि मैं अल्लाह के वास्ते कल रोज़ा रखने की नियत करता हूं तो भी काफी है। रात में रोज़ा रखने की नियत नहीं की सुबह कुछ खाया पिया नहीं और दिन चढ़े सोचा कि रोज़ा रखना है तो अब भी उसकी नियत हो जाएगी और रोज़ा हो जाएगा।

सेहरी भी रोज़ा रखने की नियत ही है लेकिन अगर किसी दिन सेहरी नहीं की देर से उठने की वजह से वक्त खत्म हो चुका था तो भी रोज़ा रखने की नियत कर ले रोज़ा हो जाएगा। सेहरी छूट जाने की वजह से रोज़ा छोड़ देना गुनाह है।

सहरी के वक्त कुछ खाना पीना सुन्नत हैं। अल्लाह के प्यारे रसूल सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने इसकी सख्त ताकीद फ़रमाई है। ज़्यादा ना खा सके तो दो चार खजूरे,छुहारे ही खाकर पानी पी ले सेहरी ना करने से जिस्म में कमजोरी आती है।

सेहरी के वक्त का खास ध्यान रखे। वक़्त खत्म होने से पहले जो खाना चाहते हैं वह खा ले। खाने के बाद पानी से कुल्ली करके मुंह साफ कर ले।
 अगर आंख देर से खुली और सेहरी का वक़्त अगर ख़त्म हो गया उसके बावजूद खा पी लिया तो अब रोज़ा नहीं होगा और यह खाना भी उसके लिए मकरूह होगा। रमज़ान का रोज़ा ऐसी हालत में बिना सेहरी के भी हो जाएगा।

इस तरह रोज़ा खोलने के वक्त का भी काफी खास ख्याल रखना ज़रूरी है। घड़ी वगैरा पर ज्यादा भरोसा करना अच्छा नहीं बल्कि सूरज डूब जाने का यकीन हो जाना भी ज़रूरी है। जल्दी के चक्कर में अगर सूरज डूबने से दो 4 मिनट पहले ही रोज़ा खोल दिया तो रोज़ा नहीं होगा बल्कि उसकी कज़ा लाज़िम होगी। जब तक सूरज के डूबने में शक हो रोज़ा खोलना जायज़ नहीं वक्त हो जाए तो बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम से और इफ्तार की दुआ अल्लाहुम्मा इन्नी लाका सुमतो व बिका अमन्तु व अलैका तवक्कलतो व अला रिज़्क़ीक़ा अफ्तरतु पढ़कर रोज़ा खोले।

रोज़ा एक फ़र्ज़ इबादत हैं, जिसके बहुत सारे फायदे हैं। दुनिया में भी और आखिरत में भी अल्लाह के रसूल ने फरमाया जिसने ईमान की हालत में सवाब की नियत से रमज़ान के रोज़े रखे उसके पिछले गुनाह माफ कर दिए जाएंगे।
इस महीने में मोमिन की नेकियों का सवाब 100 से 700 गुना तक बढ़ा दिया जाता है। अल्लाह ने फरमाया रोज़ा मेरे लिए है और मैं ही उसका बदला अता करूंगा।

रमज़ान के महीने में अल्लाह की तरफ से रहमतों की बरसात होती है। अल्लाह पाक रोज़ाना इफ्तार के वक़्त ऐसे 10 लाख  गुनाहगारों को जहन्नम से आज़ाद फरमा देता है।  जिनके लिए जहन्नम के अज़ाब  का हुक्म हो चुका होता है। इसी तरह जुमा की रात और दिन के हर हर पहर में ऐसे 10 लाख गुनाहगारों को जहन्नम के अज़ाब से बरी कर दिया जाता है। जो जहन्नम की सजा के हकदार करार पा चुके होते हैं। और फिर रमज़ान के आखिरी दिन पूरे महीने में आज़ाद किए जाने वालों के बराबर और आज़ाद कर दिए जाते हैं।

जैसा की आप सबको पता है कि रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ हैं, पर साथ ही साथ रमज़ान के महीने का एहतराम करना भी ज़रूरी है। रमज़ान की तौहीन और बेकद्री बहुत बड़ी महरूमी है। जो लोग रमज़ान के रोज़े नहीं रखते ऊपर से उसकी बेहुरमती भी करते हैं। खुले आम खाते पीते हैं। फिल्मो नाच-गानों अय्याशी में खोये रहते हैं। वह दुनिया व आखिरत में भयानक अज़ाब के शिकार होंगे। हजरत अब्दुल्ला बिन अब्बास रदियल्लाहो अन्हो का बयान है कि अल्लाह के रसूल ने फरमाया जिस ने बिना किसी शरई मजबूरी के रमज़ान का एक भी रोज़ा छोड़ दिया तो वह 9 लाख साल तक जहन्नम की आग में जलता रहेगा। इसलिए ऐ मुसलमानों अल्लाह के वास्ते अपने गुनाहों से तौबा करने में जल्दी करें और फिर नमाज रोजे के पाबंद बन जाए। अल्लाह हम सबको रमजान में रोजे रखने और नमाज की पाबंदी रखने की तौफीक अता फरमाए आमीन।  

इस्लाम में रसूल और नबी कौन हैं? Who is Rasool and Nabi in Islam?

इस्लाम में रसूल और नबी कौन हैं? Who is Rasool and Nabi in Islam?
इस्लाम में रसूल और नबी कौन हैं? Who is Rasool and Nabi in Islam?

इंसानों की हिदायत व रहनुमाई और उन तक अपना पैगाम पहुंचाने के लिए अल्लाह पाक अपने जिन महबूब बन्दों को मुकर्रर व मुन्तख़ब फरमाता हैं  उन्हें नबी,रसूल, पैगंबर कहा जाता है। अल्लाह के यह महबूब बड़ी दयानतदारी व इमानदारी से उसका पैगाम लोगों तक पहुंचाते हैं। यह मर्तबा अल्लाह ने जिसे चाहा अता फ़रमाया। कोई आदमी अपनी मेहनत या कोशिश से नबी नहीं हो सकता। दुनिया का कोई इंसान किसी नबी के बराबर नहीं हो सकता। अगर कोई आदमी ऐसा कहे तो वह काफीर हैं।

इंसानों की हिदायत के लिए जो नबी तशरीफ लाए वह इंसान और मर्द थे। कोई औरत नबी या रसूल नहीं हुई। यह शरफ़ अल्लाह ने मर्दों को बख्शा। नबी व रसूल अल्लाह के तर्जमान होते हैं जो उस का पैगाम हम तक पहुंचाते हैं और बयान करते हैं। अल्लाह पाक जो हुक्म हमारे लिए भेजता है नबी उसे बयान फरमाते और खुद भी उस पर अमल करते हैं।

अल्लाह ने हर कौम में, हर मुल्क में अपने नबी व रसूल भेजें। क़यामत के दिन कोई कौम यह नहीं कह सकेगी कि हमारी हिदायत के लिए कोई नबी नहीं आया। जिनकी किस्मत में ईमान लिखा जा चुका था, वह मोमिन हुए। नुबूवत व रिसालत का यह सिलसिला हमारे प्यारे नबी हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम पर खत्म हो गया। आप के बाद अब कोई नबी नहीं आएगा। अगर कोई आदमी अपने नबी होने का ऐलान करें या अकीदा रखें कि पैगंबरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम के बाद भी नबी आ सकता है, या आएगा तो ऐसा आदमी काफीर है क्योंकि कुरान मजीद में अल्लाह पाक ने हमारे प्यारे रसूल को खातमुन्नबिईंन(Khatam-Un-Nabiyeen) फरमाया है।

माना कि हम हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की उम्मत में है, उनका कलमा पढ़ते हैं, उनकी शरीयत पर अमल करते हैं, फिर भी हमें उन सारे नबियों रसूलों पर ईमान लाना ज़रूरी है जो आप से पहले तशरीफ़ ला चुके हैं। कहा जाता है कि एक लाख चौबीस हज़ार या दो लाख चौबीस हज़ार या कुछ कम  ज़्यादा नबी दुनिया में तशरीफ़ लाएं जिनमें से कुरान व हदीस में कुछ ही नबियो के बयान मौजूद है। फिर भी उनके अलावा हमें उन दूसरे नबियों रसूलों पर भी उसी तरह ईमान लाना, उन्हें नबी रसूल तस्लीम(स्वीकार) करना ज़रूरी है जिस तरह हम पैगंबरे इस्लाम को तस्लीम(स्वीकार) करते हैं।

हमें उन सारे नबियों-रसूलो पर ईमान लाना ज़रूरी है, जो दुनिया में हिदायत व तब्लीग के लिए भेजे गए। उनमें से किसी एक का भी इनकार करने वाला ईमान से ख़ारिज है। हम ईसाई नहीं फिर भी हमें हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को रसूल मानना ज़रूरी है। यह अलग बात है कि उन्हें मानने का दावा करने वाले लोग अपने नबी की तालीम व तब्लीग से दूर होने की वजह से गुमराह हो गए लेकिन हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की नुबूवत व रिसालत में तो कोई फर्क नहीं आया। वह अब भी नबी है।

उनके बारे में ईसाइयों का अक़ीदा है की वह उनकी बख्शीश के लिए सूली पर चढ़ गए, फांसी दे दिए गए, जबकि हमारा अकीदा है कि अल्लाह ने उन्हें जिंदा आसमान पर उठा लिया। और उन्हें कत्ल करने के लिए  लोगों ने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम जैसी शक्ल वाले अपने ही किसी दूसरे आदमी को कत्ल कर डाला। हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम कयामत के करीब वापस दुनिया में तशरीफ़ लाएंगे।

इसी तरह हम यहूदी नहीं फिर भी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह का नबी व रसूल मानते हैं। भले ही आज उनकी कौम गुमराह हो चुकी है। बहरहाल हमें अल्लाह के हर नबी रसूल पर ईमान लाना ज़रूरी है। सारे नबियों-रसूलो ने लोगो को इस्लाम की ही दावत दी। एक अल्लाह की इबादत का पैगाम दिया। इसलिए उनमें से किसी वजह से किसी एक का भी इनकार गोया सब का इनकार है। किसी की तौहीन सब की तौहीन है। हम रहमते आलम सल्लल्लाहो अलैहि  वसल्लम के उम्मती है। हमे अपने प्यारे रसूल की इज़्ज़त करना ज़रूरी है। ऐसा नहीं होना चाहिए की हम अपने नबी के अलावा दूसरे नबियों को कम समझे।

हमारे लिए मुस्तफा जाने रहमत सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम की शरीयत पर अमल करना और उनकी सुन्नतों की रोशनी में अपनी जिंदगी गुज़ारना लाज़िम हैं क्योंकि आपके हुक्म पर अमल करना, आपकी फरमाबरदारी करना गोया अल्लाह की फरमाबरदारी करना है। हमारे नबी अपनी मर्ज़ी से कुछ नहीं फरमाते बल्कि जो अल्लाह हुक्म देता है वही फरमाते हैं।

नबी व रसूल कबीले एहतराम हस्तियां हैं। उनकी ताज़ीम फ़र्ज़ हैं और तौहीन कुफ्र हैं। आदमी चाहे जितने नेक काम करे अगर वह रसूल की शान में गुस्ताखी करे तो उसका किया धरा सब बेकार हैं। इसलिए हमे अपने नबियों रसूलो का एहतराम करना ज़रूरी हैं। अगर कोई शख्स नबी की किसी पसंद को नापसंद कहे तो वह शख्स सज़ा का हक़दार हैं।

नबी तो हमें अपनी जान से भी ज़यादा प्यारे होने चाहिए वरना ईमान मुकम्मल नहीं होगा। यही तालीम अल्लाह ने क़ुरान मजीद में अपने बन्दों को दी हैं।अल्लाह हम सब को रसूलो-नबियों के फरमान पर,उनके बताये रास्ते पर चलने की तौफीक अता फरमाए आमीन। 

शब-ए-बरात क्या हैं? (What is Shab-e-Barat)

शब-ए-बरात क्या हैं? (What is Shab-e-Barat)
What is Shab-e-barat?
शाबान इस्लामी साल का आठवां महीना है। शाबान का मतलब है जमा करना और अलग करना। अल्लाह के प्यारे रसूल फरमाते हैं, शाबान मेरा महीना है, रज्जब अल्लाह का महीना है और रमजान मेरी उम्मत का महीना है। शाबान गुनाहों को मिटाने वाला और रमजान पाक करने वाला महीना है।

अल्लाह के रसूल रमज़ान के बाद सबसे ज़्यादा रोज़े शाबान महीने में रखा करते थे। शाबान महीने की 15 वी रात को शबे बरात कहा जाता है। बरात का मतलब है बरी होना,आजाद होना। चूँकि यह रात अपने गुनाहों से तौबा करके अल्लाह के फ़ज़्ल से जहन्नम के अज़ाब से आजाद होने की रात है इसलिए इसे शबे बरात कहा जाता है।  इसे बरकत वाली रात, दोज़ख से निजात पाने वाली रात और रहमत वाली रात भी कहा जाता है। इस रात के बारे में उम्मुल  मोमिनीन हज़रत बीबी आयशा सिद्दीका को बताते हुए अल्लाह के रसूल ने फरमाया की इस रात अगले साल जितने भी पैदा होने वाले होते हैं वह इस रात लिख दिए जाते हैं और जितने लोग इस साल मरने वाले होते हैं वह भी इस रात लिख दिए जाते हैं। इस रात में लोगों के साल भर के आमाल उठा लिए जाते हैं और इसी रात साल भर की मुकर्रर रोज़ी उतार दी जाती है।

अल्लाह पाक इस रात अपनी रहमत से अपने बंदों को बख्श देता है। लेकिन शिर्क करने वाले,अपने भाई से दुश्मनी रखने वालों को नहीं बक्शता इस रात तौबा करने वालो की तौबा काबुल की जाती हैं। रोज़ी में बरकत की दुआ करने वालो की रोज़ी में बरकत अता की जाती हैं। बीमारों के लिए दुआ मांगने पर बीमारों को बीमारी से शिफा दी जाती हैं।

इस रात कब्रिस्तान जाना फातिहा पढ़ना इसाले सवाब करना और दुआए मगफिरत करना सुन्नत है। हदीस शरीफ में है, जो आदमी 11 बार कुल हुवल्लाह शरीफ पढ़ कर उसका सवाब मुर्दो की रूहों को पहुंचाएं तो मुर्दों को सवाब पहुँचाने के साथ ही पढ़ने वाले को मुर्दो की तादात के बराबर सवाब मिलेगा। इस रात बेरी के 7 पत्ते पानी में उबालकर उस पानी से नहाए तो इंशाल्लाह साल भर तक जादू टोने के असर से महफूज़ रहेगा।

इस रात तीन काम करने चाहिए,
1.कब्रस्तान जाकर मुर्दों के लिए इस वाले सवाल और दुआए मगफिरत की जाए।
 2.यह रात नफिल नमाज पढ़ने तिलावत करने और दुरूद व दुआ पढ़ने के साथ अपने गुनाहों से तौबा करने में बितायी जाए ताकि अल्लाह की रेहमत हमारे गुनाहों पर पर्दा डालकर हमें दोज़ख की आग से बरी होने का हकदार बना दे।
 3.रात इबादत में गुजारने के बाद दिन में रोजा रखा जाए यह सुन्नत है।

इसके अलावा इसाले सवाब के लिए कुछ मीठी चीजें बनवाना फातिहा लगवाना खाना खिलाना व तोहफे पेश करने में कोई हर्ज नहीं लेकिन इसे पटाखों का त्यौहार समझना नादानी है जो सरासर नाजायज़ और हराम है। इस रात में अल्लाह पाक बनी कलब की बकरियों के बाल की तादात के बराबर गुनाहगारों को जहन्नम से आज़ाद फरमा देता है। लेकिन काफिर, दुश्मनी रखने वाले, रिश्ता तोड़ने वाले, मां बाप की नाफरमानी करने वाले और शराब पीने वालों पर रहम नहीं फरमाता। ऐसे लोगों की बख्शीश नहीं होती।

इस रात का फैज़ हासिल करने के लिए चाहिए कि अपने गुनाहों से सच्ची तौबा करें, अगर मां-बाप नाराज़ है तो उन्हें खुश किया जाए क्योंकि जब तक वह राज़ी नहीं होंगे तब तक अल्लाह राज़ी नहीं होगा। किसी दिनी भाई से मनमुटाव हो गया हो या सलाम कलाम बंद हो तो मेल मिलाप करके गलतफहमी दूर करके इसका बहाल किया जाए फिर अपने रब से रहम व करम और मगफिरत की भीख मांगी जाये इस यकीन के साथ की अल्लाह पाक हमें भी इसके फैज़ से मालामाल फरमाएगा।

इस रात में इबादत करने का सवाब दूसरी रातो के मुकाबले ज्यादा मिलता है। एक हदीस में है जो आदमी इस रात 100 रकात नफ़्ल नमाज़ पढ़े अल्लाह उसके पास 100 फरिश्ते भेजेगा उनमें से 30 फरिश्ते उसे जन्नत की बशारत सुनाएंगे। 30 फरिश्ते उसे दोज़ख के अज़ाब से महफूज रहने की खुशखबरी देंगे और 30 फ़रिश्ते उसे दुनियावी बलाओं और मुसीबतों से बचाएंगे और 10 फ़रिश्ते शैतान के वसवसे और धोखे से बचाएंगे। इस रात मुस्तफा जाने रेहमत सल्ललाहो अलैहि वस्सलम की उम्मत पर अल्लाह की खास रहमतें नाज़िल होती है।

यह रात तौबा इस्तिगफार की रात है इसलिए हमें चाहिए कि हम इसकी कद्र करें इसकी अहमियत समझे और अपने गुनाहों से माफी मांगे,तौबा करे और  तौबा पर कायम रहने की नियत भी रखें।

इस्लाम में बहन बेटी की हदीस (Behen Beti Ki Hadees in Islam)

बेटियां हमारे लिए अल्लाह की नेअमत व रहमत हैं। लेकिन अफ़सोस आज दुनिया ने अपने गलत ख़यालो और रस्मो की वजह से उन्हें अपने लिए मुसीबत समझ लिया...